छेरछेरा
(छत्तीसगढ़ी कविता | मौलिक रचना)
छेरछेरा छेरछेरा, दान धरम के बेरा,
घर-घर गूंजे सुर मं, खुशी के हे फेरा।
नवा धान के खुशबू, अँगना ल महकाए,
भूखे मन के पीरा, दान ले मिट जाए।
सुआ-गीत, मंदर बाजे, गांव हंसी से भरे,
छोटे-बड़े सब मिलके, मया के रंग बिखेरे।
छेरछेरा मं बसे हे, अपनपन के बात,
दान देके बन जाथे, हर दिन परब के रात। 🌾
रचनाकार
कौशल
02.01.2026
छेरछेरा
छेरछेरा
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