कलम संगिनी

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छेरछेरा

HARNARAYAN KURREY

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छेरछेरा

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छेरछेरा
छेरछेरा (छत्तीसगढ़ी कविता | मौलिक रचना) छेरछेरा छेरछेरा, दान धरम के बेरा, घर-घर गूंजे सुर मं, खुशी के हे फेरा। नवा धान के खुशबू, अँगना ल महकाए, भूखे मन के पीरा, दान ले मिट जाए। सुआ-गीत, मंदर बाजे, गांव हंसी से भरे, छोटे-बड़े सब मिलके, मया के रंग बिखेरे। छेरछेरा मं बसे हे, अपनपन के बात, दान देके बन जाथे, हर दिन परब के रात। 🌾 रचनाकार कौशल 02.01.2026

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