दो दशक का इंतज़ार, वर्षों का सुकून दे गया — डलहौजी और धर्मशाला प्रवास
जीवन में कुछ यात्राएँ केवल घूमने-फिरने के लिए नहीं होतीं, वे एक लंबे समय से संजोए गए सपने का साकार रूप होती हैं। मेरे लिए गत सप्ताह कि गई हिमाचल प्रदेश के डलहौजी और धर्मशाला की यात्रा भी कुछ ऐसी ही रही। पिछले 23 वर्षों से (विवाह के बाद से ही) मन में अंग्रेजों द्वारा बसाए गए डलहौजी शहर को देखने की इच्छा थी। कई बार योजना बनी, टिकटों की चर्चा हुई, संभावित कार्यक्रम तैयार हुए, लेकिन हर बार किसी न किसी कारण से यात्रा टलती रही। समय बीतता गया, लेकिन मन के किसी कोने में यह इच्छा जीवित रही।
आखिरकार, इस वर्ष परिवार और मित्रों के साथ उस इच्छा को पूरा करने का अवसर मिला। एक सप्ताह के लिए हमने हिमाचल प्रदेश की वादियों की ओर प्रस्थान किया। उत्तर प्रदेश की तपती गर्मी से निकलकर जैसे ही हिमाचल की सीमा में प्रवेश किया, ठंडी और सुकून भरी हवाओं ने हमारा स्वागत किया। ऐसा लगा मानो प्रकृति स्वयं हमें वर्षों के इंतज़ार का पुरस्कार दे रही हो।
हमारी यात्रा का पहला पड़ाव धर्मशाला और मैकलोडगंज रहा। धौलाधार पर्वतमाला की गोद में बसे इस शहर की खूबसूरती ने पहली ही नज़र में मन मोह लिया। पठानकोट से आगे बढ़ते हुए जैसे ही बर्फ से ढकी पहाड़ियाँ दिखाई दीं, सफ़र की सारी थकान छूमंतर हो गई। पता था कि हम इन पहाड़ियों के पास जा रहे हैं, फिर भी उन्हें कैमरे में कैद करना शुरू कर दिया। जैसे-जैसे हम आगे बढ़ते गए, हम इन बर्फ से ढकी पहाड़ियों की खूबसूरती में खोते चले गए।
सबसे पहले हम नए बने स्टेडियम को देखने गए। पूरी रुचि और सौंदर्यबोध के साथ बनाए गए इस स्टेडियम के चारों तरफ धौलाधार पर्वतमाला का अद्भुत दृश्य दिखाई देता है। अंदर कई आकर्षक फोटो पॉइंट बनाए गए हैं। उन्हें देखते-देखते कब एक घंटा बीत गया, पता ही नहीं चला।
हमारा पहला पड़ाव मैकलोडगंज था, जहाँ हिमाचल प्रदेश पर्यटन निगम का होटल भागसू हमारा इंतज़ार कर रहा था। पाइन के वृक्षों से घिरा और खूबसूरत फूलों की बगिया से सजा यह विश्राम गृह लंबे सफ़र के बाद वास्तव में सुकून देने वाला था। होटल के कमरे में पहुँचने के बाद भी बाहर के दृश्यों को एक साथ देख लेने की इच्छा चरम पर थी। शायद इसका कारण पहाड़ों का पुराना अनुभव भी था कि यहाँ के नज़ारे कब बदल जाएँ, कुछ कहा नहीं जा सकता। ढलती शाम के नज़ारे वैसे भी अत्यंत खूबसूरत होते हैं।
जैसे ही शाम ढली, आकाश में चंद्रमा, गुरु, शुक्र और बुध ग्रह एक साथ चमकते दिखाई दिए। ऐसे दृश्य लखनऊ में बिना दूरबीन के देखना संभव नहीं होता। इस प्रकार यहाँ हमारी पहली इच्छा पूरी हुई।
अगली सुबह कार्यक्रम बना पालमपुर के प्रसिद्ध चाय बागानों में समय बिताने का। वहाँ बिताए गए कुछ घंटे जीवन की भागदौड़ से दूर, प्रकृति के साथ बिताए गए सबसे शांत और सुकून भरे क्षणों में शामिल हो गए। सुव्यवस्थित चाय बागान, पाइन के पेड़ों से घिरा खुला वातावरण और आसपास का प्राकृतिक सौंदर्य मानो बार-बार आने का निमंत्रण दे रहा था। वहाँ का वातावरण आत्मा तक को स्पर्श कर रहा था।
वापसी में माँ चामुंडा देवी के मंदिर में दर्शन किए। यह 51 शक्तिपीठों में से एक है। मान्यता है कि यहाँ माता सती के चरण गिरे थे। यह मंदिर बाणगंगा (बनेर) नदी के तट पर स्थित है। नदी पर बने पुल के दोनों ओर कल-कल बहता जल, पत्थरों के बीच अपना मार्ग बनाते हुए मानो यह संदेश दे रहा था कि पानी की धारा अपनी राह बना ही लेती है, चाहे उसे रोकने का कितना भी प्रयास क्यों न किया जाए।
इसके बाद बस स्टैंड पर अपनी गाड़ी खड़ी कर हमने ऊपर जाने के लिए स्काईवे, अर्थात ट्रॉली यात्रा का विकल्प चुना। हवा में चलते हुए खूबसूरत वादियों के दर्शन तो हुए ही, साथ ही रोमांच का भी भरपूर आनंद मिला। कुछ पल के लिए मन में यह विचार भी आया कि यदि यह कहीं रुक जाए तो क्या होगा, लेकिन जब परिवार साथ हो, तो एक-दूसरे का साहस ही सबसे बड़ा संबल बन जाता है।
इस प्रकार हम नीचे से ऊपर पहाड़ पर स्थित दलाई लामा मंदिर पहुँच गए और एक भिन्न संस्कृति को समझने तथा जानने का अवसर मिला।
दलाई लामा मंदिर धर्मशाला के मैकलोडगंज क्षेत्र में स्थित विश्व प्रसिद्ध बौद्ध आध्यात्मिक केंद्र है। यह मंदिर तिब्बती बौद्ध धर्म के सर्वोच्च आध्यात्मिक गुरु, 14वें दलाई लामा का आधिकारिक निवास एवं प्रार्थना स्थल है। वर्ष 1959 में तिब्बत से निर्वासन के बाद दलाई लामा ने धर्मशाला को अपना केंद्र बनाया, जिसके बाद यह स्थान तिब्बती संस्कृति, शांति और करुणा का वैश्विक प्रतीक बन गया। मंदिर परिसर में विशाल बुद्ध प्रतिमा, प्रार्थना चक्र, रंग-बिरंगे प्रार्थना ध्वज तथा शांत वातावरण एक अलग ही आध्यात्मिक अनुभूति प्रदान करते हैं। धौलाधार पर्वतमाला की मनोहारी पृष्ठभूमि में स्थित यह स्थल न केवल धार्मिक आस्था का केंद्र है, बल्कि विश्वभर से आने वाले लोगों के लिए शांति, ध्यान और सांस्कृतिक विरासत का अद्भुत संगम भी प्रस्तुत करता है।
तिब्बती मान्यता के अनुसार, प्रार्थना चक्र के भीतर लिखे हजारों मंत्रों का पुण्यफल उसके प्रत्येक घुमाव के साथ प्राप्त होता है। इसलिए हमने भी शांत भाव से प्रार्थना चक्र घुमाते हुए "ॐ मणि पद्मे हूं" का जप किया।
अब तक दिन ढल चुका था। कुछ लोग होटल वापस लौट आए, जिसके लिए कठिन पहाड़ी रास्ते को चुना गया और मानो ट्रेडमिल एक्सरसाइज़ का अनुभव प्राप्त हुआ। कुछ साथी आसपास के बाज़ार की रौनक देखते हुए अपेक्षाकृत सरल मार्ग से होटल पहुँचे। इसके बाद सभी ने मिलकर चंद्रमा की रोशनी में रात्रि भोज किया और अगले दिन नए स्थानों को देखने की इच्छा के साथ विश्राम किया।
तीसरा दिन समर्पित था राजा भगसू द्वारा स्थापित भगसूनाग मंदिर और भगसू जलप्रपात के दर्शन के लिए।
मैक्लोडगंज से लगभग दो किलोमीटर की दूरी पर स्थित भगसूनाग मंदिर हिमाचल प्रदेश के सबसे प्रसिद्ध धार्मिक और पर्यटन स्थलों में से एक है। भगवान शिव और नाग देवता को समर्पित यह प्राचीन मंदिर अपनी धार्मिक आस्था, प्राकृतिक सौंदर्य और पौराणिक कथाओं के लिए प्रसिद्ध है। मान्यता है कि प्राचीन काल में राजा भगसू ने अपने राज्य में पड़े भयंकर अकाल से लोगों को बचाने के लिए नागदल झील से जल लाने का प्रयास किया था। नाग देवता से हुए संघर्ष के बाद उन्होंने क्षमा मांगी और तभी से इस स्थान का नाम 'भगसूनाग' पड़ा।
मंदिर परिसर में स्थित प्राकृतिक जलकुंड का जल अत्यंत शीतल और पवित्र माना जाता है। इसे एक स्विमिंग पूल की तरह विकसित किया गया है, जहाँ श्रद्धालु स्नान कर आध्यात्मिक शांति का अनुभव करते हैं। परंतु हमने पहले मंदिर से लगभग दो किलोमीटर की दूरी पर स्थित भगसू जलप्रपात की ओर प्रस्थान किया। ट्रेकिंग और पैदल यात्रा करते हुए हम भगसू जलप्रपात पहुँचे। यह स्थान प्रकृति प्रेमियों के लिए किसी स्वर्ग से कम नहीं है।
धौलाधार पर्वत श्रृंखला से गिरता यह मनमोहक जलप्रपात हरे-भरे वृक्षों, चट्टानों और पहाड़ी वातावरण के बीच अद्भुत दृश्य प्रस्तुत करता है। यहाँ जल प्रवाह अत्यंत आकर्षक और प्रबल है। जलप्रपात तक जाने वाले मार्ग में बने छोटे-छोटे कैफे और विश्राम स्थल यात्रियों के अनुभव को और भी यादगार बनाते हैं। चार घंटे कब बीत गए, पता ही नहीं चला। प्रकृति की गोद में बिताया गया यह समय हमेशा ऊर्जा का स्रोत बना रहेगा।
वापसी में हमने मंदिर परिसर की आध्यात्मिक ऊर्जा का अनुभव किया, लेकिन इसी बीच हुई बारिश ने मंदिर के आसपास मिलने वाली सुंदर और आकर्षक वस्तुओं की खरीदारी की हमारी योजना को ध्वस्त कर दिया।
धर्मशाला की यात्रा का एक और यादगार अनुभव नड्डी सनसेट व्यू पॉइंट पर मिला। जब सूर्य धीरे-धीरे धौलाधार पर्वतों के पीछे छिप रहा था और उसकी सुनहरी किरणें आकाश को रंग रही थीं, तब ऐसा लग रहा था मानो प्रकृति अपने सबसे सुंदर रूप में हमारे सामने उपस्थित हो। उस दृश्य को कैमरे में कैद तो किया जा सकता था, लेकिन उसकी अनुभूति को शब्दों में पूरी तरह व्यक्त करना संभव नहीं है।
थोड़ा, पर यादगार समय हमने मैकलोडगंज के स्थानीय तिब्बती बाज़ार में भी बिताया। वहाँ की संस्कृति, लोगों की सादगी, हस्तशिल्प और स्थानीय व्यंजनों को जानने का अवसर मिला। अगली सुबह इरादा था कि बचे हुए स्थानीय स्थल, चर्च और इको गार्डन भी देखे जाएँ, लेकिन बारिश ने ऐसा होने नहीं दिया।
इसके बाद हमारी यात्रा डलहौजी की ओर बढ़ी। रास्ते भर पहाड़ों के घुमावदार मार्ग, बादलों की अठखेलियाँ और हरे-भरे जंगल यात्रा को रोमांचक बनाते रहे। डलहौजी पहुँचकर ऐसा लगा जैसे हम किसी चित्रकार की बनाई हुई खूबसूरत पेंटिंग के बीच आ गए हों।
होटल मणिमहेश की बालकनी से दिखाई देती पीर पंजाल पर्वतमाला के बीच ढलती सिंदूरी शाम को देखना एक अविस्मरणीय अनुभव था। साथ ही, 23 वर्षों के लंबे इंतज़ार का पूरा होना एक अलग ही सुकून दे रहा था। हवा के साथ तन को शीतल करती ठंड मैदानों के खुशनुमा फरवरी और दिसंबर के मौसम की याद दिला रही थी। मन का एक हिस्सा शॉल ओढ़ने का आग्रह कर रहा था, तो दूसरा उस ठंडक को पूरी तरह महसूस कर लेने की इच्छा रखता था।
डलहौजी की सुबह बारिश की फुहारों के साथ हुई। परंतु मन में घूमने की इच्छा प्रबल थी, इसलिए थोड़ी देर से ही सही, हम चंबा घाटी की प्राकृतिक सुंदरता देखने निकल पड़े। और वास्तव में, इसने हमें मंत्रमुग्ध कर दिया।
सबसे पहले हम चामेरा झील पहुँचे। यह एक मनोहारी कृत्रिम झील है, जिसका निर्माण चामेरा बांध के बनने के बाद हुआ। यह झील रावी नदी पर स्थित है और डलहौजी से लगभग 25 किलोमीटर की दूरी पर है। चारों ओर ऊँचे-ऊँचे पर्वतों, घने देवदार के जंगलों और शांत वातावरण से घिरी यह झील पर्यटकों के आकर्षण का प्रमुख केंद्र है। यहाँ के शांत और विस्तृत जल में नौकाविहार का आनंद लिया गया। इसके आसपास फैले पहाड़ों और ठंडी हवाओं ने मन को गहरे तक सुकून पहुँचाया।
इसके बाद हम चंबा नगर पहुँचे, जहाँ दसवीं शताब्दी का प्रसिद्ध लक्ष्मी नारायण मंदिर स्थित है। वर्षों पुराने भवनों में स्थापित देव विग्रह श्रद्धालुओं को अपनी ओर आकर्षित कर रहे थे। यह ऐतिहासिक मंदिर परिसर मानो यह बता रहा था कि प्राचीन काल में देवी-देवताओं को कितना विशिष्ट स्थान दिया जाता था और परिवार के सदस्यों की तरह उनकी प्रत्येक आवश्यकता का ध्यान रखा जाता था।
मंदिर परिसर में एकादशी के अवसर पर राधारमण के भजन-कीर्तन चल रहे थे और श्रद्धालु भक्ति रस में डूबे हुए थे। वहाँ का आध्यात्मिक वातावरण मन को गहरे तक स्पर्श कर रहा था।
इसके बाद हम भूरी सिंह संग्रहालय पहुँचे, लेकिन देर हो जाने के कारण संग्रहालय बंद हो चुका था। इसलिए कुछ समय यूँ ही चंबा घाटी में घूमते हुए बिताया गया। थोड़ा बहुत खाया-पिया गया और फिर वापसी की राह पकड़ी गई। वापसी की यात्रा कुछ थकान भरी अवश्य थी, लेकिन पहाड़ी नदी के साथ-साथ चलते हुए जो मनोरम दृश्य दिखाई दे रहे थे, वे मानो जीवन भर वहीं रुक जाने का निमंत्रण दे रहे थे।
अगला दिन विशेष था, क्योंकि हमें जाना था खज्जियार, जिसे भारत का "मिनी स्विट्जरलैंड" कहा जाता है। यह स्थान वास्तव में अपनी उपमा को पूरी तरह सार्थक करता दिखाई दिया। हरी-भरी घास, देवदार के वृक्षों से घिरा विस्तृत मैदान और बादलों का आना-जाना एक स्वप्नलोक जैसा अनुभव प्रदान कर रहा था।
यहाँ पारंपरिक वेशभूषा में चलचित्र बनाने और तस्वीरें खिंचवाने का शौक भी पूरा किया गया। सभी ने खूब फोटो खिंचवाईं। ऊपर खज्जियार गाँव तक जीप से जाने का रोमांचक अनुभव लिया गया। ज़िप लाइन जैसे साहसिक खेलों का भी आनंद उठाया गया। लेकिन सबसे विशेष अनुभव था, इन खूबसूरत दृश्यों को जीवन भर के लिए अपने हृदय में संजो लेना।
यहाँ सुबह से शाम कब हो गई, पता ही नहीं चला। इसी कारण कालाटोप वन्यजीव अभयारण्य जाना नहीं हो पाया, लेकिन घने जंगलों के बीच बिताए गए समय ने प्रकृति के साथ एक गहरा जुड़ाव महसूस कराया। दिन की साँझ में डलहौजी की मॉल रोड और तिब्बती मार्केट की सैर भी अत्यंत रोमांचक रही। स्थानीय बाज़ार की चहल-पहल, पहाड़ी संस्कृति की झलक और ठंडी हवाओं ने इस अनुभव को और भी यादगार बना दिया।
इसके बाद बारी थी विदाई की। इस दिन को अंतिम याद के रूप में सहेजने के लिए हम हिमाचल और जम्मू कश्मीर कि सीमा पर स्थित "मिनी गोवा" क्षेत्र पहुँचे। यहाँ प्रकृति का एक अलग ही रूप देखने को मिला। बहती हुई नदी, पहाड़ों से घिरा परिवेश और शांत वातावरण ने हमें कुछ समय तक वहीं ठहरने के लिए विवश कर दिया। यहाँ की हवा अपेक्षाकृत गर्म थी, लेकिन वातावरण की शांति मन को बहुत सुकून दे रही थी।
हम चाह रहे थे कि यदि बारिश हो जाए तो इस स्थान का आनंद और भी बढ़ जाए, लेकिन ऐसा नहीं हुआ और हम अपने अंतिम गंतव्य, पांडव गुफाओं की ओर चल पड़े। ये गुफाएँ रंजीत सागर बांध के पार्श्व क्षेत्र में स्थित हैं। लगभग 300 सीढ़ियाँ नीचे उतरकर हमने शीतल जल के बीच कुछ समय आनंदपूर्वक बिताया। हालाँकि, वापसी में चढ़ाई के दौरान साँसें कुछ तेज़ अवश्य हो गईं।
मान्यता है कि पांडवों ने अपने अज्ञातवास के दौरान यहाँ ध्यान साधना की थी। इसलिए हमने भी कुछ समय शांत बैठकर ध्यान करने का प्रयास किया। पहाड़ों की नीरवता और प्रकृति की गोद में बिताए गए वे कुछ क्षण मन को भीतर तक शांति देने वाले थे।
यात्रा के दौरान बारिश ने कई बार हमारी योजनाओं को प्रभावित किया। लेकिन आज एक सप्ताह बाद भी जब उन पलों को याद करते हैं, तो लगता है कि वे छोटी-छोटी असुविधाएँ ही इस यात्रा को और अधिक यादगार बना गईं। आखिरकार, तपती गर्मी से दूर, ठंडी हवाओं और पहाड़ों की बारिश का आनंद लेना अपने आप में एक अनमोल अनुभव था।
जब सात दिनों के बाद वापसी का समय आया, तो मन में एक संतोष था कि 23 वर्षों से देखा गया सपना आखिरकार पूरा हो गया। यह यात्रा केवल हिमाचल की सुंदर वादियों को देखने की यात्रा नहीं थी, बल्कि परिवार और मित्रों के साथ बिताए गए उन अनमोल पलों की यात्रा थी, जो जीवन भर स्मृतियों में संजोए रहेंगे।
अब जब कि बच्चे भी अपनी गर्मी कि छुट्टियाँ बिता कर अपने गंतव्य पर पहुँच गए है इन तस्वीरों में उनकी छवि एक अलग सा अहसास कराती है। आज भी जब उन तस्वीरों को देखते हैं या उन क्षणों को याद करते हैं, तो मन यही कह उठता है कि कुछ सपनों को पूरा होने में भले ही वर्षों लग जाएँ, लेकिन जब वे पूरे होते हैं, तो उनकी खुशी और संतुष्टि शब्दों से कहीं अधिक होती है।
शायद जीवन की सबसे सुंदर यात्राएँ वही होती हैं, जिनकी प्रतीक्षा सबसे लंबी होती है। और जब वे पूरी होती हैं, तो वे केवल एक यात्रा नहीं रहतीं, बल्कि जीवन की अमूल्य स्मृतियों का हिस्सा बन जाती हैं।
डॉ रंजना द्विवेदी ‘विद्याचास्पति’
लखनऊ
धर्मशाला-डलहौज़ी यात्रा का सुकून
धर्मशाला-डलहौज़ी यात्रा का सुकून
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