"पुराना घर"
मौलिक रचना
पुराना घर आज भी मुझसे बातें करता है,
दीवारों में कैद हर लम्हा साँसें भरता है।
आँगन की मिट्टी में बचपन सोया मिलता,
हर कोने में हँसी का साया रहता पलता।
खिड़की से झाँकती धूप कहानी सुनाती,
छप्पर पर बरसात स्मृतियाँ जग जाती।
सीढ़ियों की चरमर में समय बोल उठता,
बीता हर दिन आँखों में फिर से घुल जाता।
माँ की पुकार अब भी हवा में गूँजती,
पिता की छाया हर राह पर साथ चलती।
टूटे से दरवाज़े, पर यादें सलामत,
पुराना घर है मेरा, आज भी उतना ही हिफ़ाज़त।
रचनाकार
"कौशल "
16.01.2026
पुराना घर
पुराना घर
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