कलम संगिनी

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आदित्यायन साहित्य दर्पण: अक्षय नवमी- आँवला नवमी

adi.s.mishra

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आदित्यायन साहित्य दर्पण: अक्षय नवमी- आँवला नवमी

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आदित्यायन साहित्य दर्पण: अक्षय नवमी- आँवला नवमी
*अक्षय नवमी-आँवला नवमी* ॐ मंगलम भगवान विष्णु, मंगलम गरुड़ध्वज:, मंगलम् पुण्डरीकाक्ष, मंगलाय तनोहरि:। ॐ कर्पूर गौरम करुणावतारम, संसार सारम भुजगेन्द्र हारम, सदावसंतम् हृदयारविन्दे, भवम् भवानी सहितम नमामि। आँवला नवमी (जिसे अक्षय नवमी भी कहते हैं) का पर्व आँवले के पेड़ की पूजा के साथ मनाया जाता है।पौराणिक कथा के अनुसार इसी दिन देवी लक्ष्मी ने भगवान श्री हरि विष्णु और भोलेनाथ श्री शिव जी की एक साथ पूजा करने के लिए आँवले के वृक्ष की पूजा की थी। इस दिन आँवले के वृक्ष के नीचे बैठकर भोजन करने और आँवला खाने का विशेष महत्व है, जो सुख, समृद्धि और अच्छी सेहत लाता है। पौराणिक कथाओं में एक कथा के अनुसार, देवी लक्ष्मी पृथ्वी पर भ्रमण कर रही थीं और उन्होंने भगवान विष्णु और शिव जी की एक साथ पूजा करने की इच्छा व्यक्त की। उन्होंने देखा कि भगवान विष्णु को तुलसी और भगवान शिव को बेल पत्र प्रिय है, और यह गुण आँवले के पेड़ में भी है। इसीलिये पूजा की शुरुआत लक्ष्मी जी ने आँवले के पेड़ को विष्णु और शिव का प्रतीक मानकर उसकी पूजा की, जिससे प्रसन्न होकर दोनों देवता प्रकट हुए। तत्पश्चात देवी लक्ष्मी ने आँवले के पेड़ के नीचे भोजन बनाया और दोनों देवताओं को भोजन कराया, फिर खुद प्रसाद ग्रहण किया। जिस दिन यह घटना हुई, वह कार्तिक शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि थी, इसीलिए तब से यह पर्व इस तिथि को मनाया जाता है। शास्त्रों के अनुसार, कार्तिक नवमी से कार्तिक पूर्णिमा तक भगवान विष्णु आँवले के पेड़ में निवास करते हैं। उसी दिन से सत्य युग की शुरुआत भी माना जाता है और भगवान कृष्ण ने वृंदावन से मथुरा की यात्रा की थी। इस दिन आँवला खाने से शरीर स्वस्थ रहता है और धार्मिक कार्यों से अक्षय फलों की प्राप्ति होती है, जिससे मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं। माना जाता है कि यह दिन पितरों की आत्मा की शांति के लिए तर्पण करने और उन्हें श्रद्धांजलि देने के लिए भी महत्वपूर्ण है। डॉ कर्नल आदि शंकर मिश्र ‘आदित्य’, ‘विद्यावाचस्पति’ लखनऊ:31-10-2025

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