कलम संगिनी

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रहने दो

HARNARAYAN KURREY

HARNARAYAN KURREY

1 Followers 93 Posts Oct 2025

रहने दो

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रहने दो
शीर्षक – "रहने दो" कविता मौलिक रचना रहने दो कुछ बातें अनकही, शब्दों का क्या भरोसा, खामोशी भी कह देती है, दिल का सारा अफ़सोसा। रहने दो बीते कल के साये, आज की धूप सँवारें, जो खो गया उसे छोड़ चलें, नए सफ़र को निहारें। रहने दो शिकवे-शिकायत, मन को हल्का कर लें, हर चोट को तजुर्बा मान, आगे बढ़ना सीख लें। रहने दो कुछ रिश्ते ऐसे, जो बोझ बने हर बार, सच्चे अपने वही जो दें, मुस्कान और अधिकार। रहने दो तुलना दुनिया की, अपनी राह चुन लें, जो हम हैं, जैसे हैं वैसे, खुद को ही स्वीकारें। रहने दो शोर बहुतों का, मन की बात सुनें, रहने दो—यही सुकून है, खुद में खुद को बुनें। रचनाकार "कौशल" 01.01.2026

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