कलम संगिनी

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बैसवाड़ा प्रचलित नाम बैसवारा

adi.s.mishra

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बैसवाड़ा प्रचलित नाम बैसवारा

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बैसवाड़ा प्रचलित नाम बैसवारा
*बैसवाड़ा (बैसवारा)* साहित्य और शौर्य की सांस्कृतिक परंपरा वाला बैसवारा क्षेत्र एक राजनैतिक इकाई के रूप में अपनी पुरानी पहचान वापस पाने के लिए प्रयासरत है। बैस राजपूतों के प्रभाव व साढ़े बाइस परगनों का क्षेत्र होने के कारण इसे बैसवारा कहा गया। इन बाइस परगनों में आज के उन्नाव, रायबरेली व बाराबंकी के थोड़े थोड़े भाग सम्मलित हैं। बैसवाड़ा की स्थापना बैस राजपूत राजा अभयचंद बैस ने की थी। महाराज अभय चंद, थानेश्वर के महाराजाधिराजा महाराजापुत्र शिलादित्य हर्षवर्धन के 25वें वंशज थे। इन बाइस परगनों में निगोहा, मोहनलालगंज, हसनगंज, हड़हा, सरवन, परसंदन, डौडियाखेड़ा, घाटमपुर, भगवंत नगर, बिहार, पाटन, पनहन, मगरायर, खीरों, सरेनी, बरेली, डलमऊ, बछरावां, कुम्हरावां, बिजनौर, हैदरगढ़, पुरवा-मौरावाँ शामिल हैं। आईने अकबर में भी बैसवारा क्षेत्र के उल्लेख हैं। उस समय बैसवारा क्षेत्र में दो हजार दो सौ पांच गांव तथा क्षेत्रफल तेरह लाख चौहत्तर हजार एक सौ चार एकड़ था। कविवर गिरधारी ने भी बैसवारे का वर्णन करते हुए किस क्षेत्र में कौन से राजा का अधिकार था इसका उल्लेख किया है। कहा जाता है कि बैसवारा क्षेत्र की आधारशिला बैस राजपूतों अभयचंद्र व निर्भयचंद्र ने रखी थी। गंगा दशहरा मेले के समय बक्सर आयी अरगल की राजकुमारी पर भर जाति के लोगों ने कुदृष्टि डाली तो मेले में घूम रहे बैसवंस के दोनों भाइयों से सहन नहीं हुआ। भयंकर युद्ध हुआ जिसमें निर्भयचंद्र शहीद हुए। किंतु राजकुमारी की लाज बचा ली। राजा अरगल ने अभयचंद्र को अपना दामाद बनाकर यही साढ़े बाइस परगने दहेज में दे दिये, जिससे बैसवारा अस्तित्व में आया। इसी वंश परंपरा में आगे चलकर राजा सातन देव व लोकनायक बाबा तिलोक चंद्र हुए। राणा बेनीमाधव तथा राव रामबख्श सिंह की वीरता किसी परिचय की मोहताज नहीं है। इन क्रांतिकारी वीरों ने अपने जीते जी कभी बैसवारे में अंग्रेजों का झंडा गड़ने नहीं दिया। यहां के शौर्य पराक्रम और आन बान की शान में अंग्रेजों को इस क्षेत्र का विघटन करने के लिए विवश कर दिया। इसके लिए उन्होंने संपूर्ण बैसवारे को उन्नाव, रायबरेली, लखनऊ व बाराबंकी जिलों में विघटित कर दिया ताकि यहां के लोग एक स्थान पर एकत्र न हो सकें और इस प्रकार से बैसवारा विखंडित होकर रह गया ओर आज तक अपने पुराने रूप में नहीं आ सका। भले ही बैसवारा विखंडित हो किंतु बैसवारी आज भी लोगों के हृदय में हिलोरे मारती है। साहित्यकारों में सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’, शिवमंगल सिंह ‘सुमन’, चंद्र भूषण त्रिवेदी ‘रमई काका’, आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी, प्रताप नारायण मिश्र, नंद दुलारे बाजपेई, जैसे शिक्षाविद व साहित्यकार तथा कृष्णदत्त बाजपेई पुरातत्वविद् सभी बैसवारा का प्रतिनिधित्व करते हैं। पंडित द्वारिका प्रसाद मिश्र, पंडित रविशंकर शुक्ल, श्यामा चरण शुक्ल, विद्याचरण शुक्ल, देवदत्त मिश्र, विधायक (संपादक विश्वामित्र कानपुर), सुंदर लाल त्रिपाठी (संपादक दैनिक विश्व मित्र, बंबई) और हमारी उत्तर प्रदेश विधानसभा के पूर्व अध्यक्ष श्री हृदय नारायण दीक्षित जी जैसे साहित्यकार और राजनेता बैसवारा की शान हैं। बैसवारा के ही स्वतंत्रता सेनानी चन्द्र शेखर आज़ाद को कौन नहीं जानता है जिन्होंने अंग्रेजों से डटकर सामना किया और जब ऐसा लगा कि वे अंग्रेज़ों से घिर गये हैं तो उन्होंने अपनी पिस्तौल से ख़ुद को गोली मार ली थी। भारतीय सेना में भी बैसवारा के अनेकों सैनिकों का योगदान और बलिदान हुआ है। कर्नल आर बी सिंह, (सेवा निवृत्त) की पहले की कई पीढ़ियाँ सेना की राजपूत रेजिमेंट में रही हैं। प्रख्यात साहित्यकार/ कवि/ लेखक सेना से सेवा निवृत विद्यावाचस्पति डॉ कर्नल आदि शंकर मिश्र ‘आदित्य’ के पिता के पितामह और उनके परनाना भी ब्रिटिश सेना में सूबेदार मेजर थे। कर्नल मिश्र के भतीजे, भांजे भी भारतीय वायु सेना से सेवानिवृत्त हैं। कर्नल शिव चन्द सिंह, सेना डाक सेवा से सेवा निवृत हैं। इसी तरह बैसवारा के अन्य अनेकों लोग सेना सेवा में रहे हैं और आज भी हैं। नाम ना बताईबे हम, हाँ काम राष्ट्रवादी है, बस एतना तुम जानि लेव, हम रहित बैसवारे मा। विद्यावाचस्पति डा० कर्नल आदिशंकर मिश्र ‘आदित्य’ लखनऊ - 10 फ़रवरी 2026

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