हिन्दी तो चिर अविनाशी है
*मेरी हिन्दी तो चिर अविनाशी है*
*भाषा नहीं, संस्कृति की आत्मा है।*
*डॉ. कर्नल आदिशंकर मिश्र 'आदित्य'*
हिन्दी केवल एक भाषा नहीं है। वह एक भाव है, एक संस्कार है, एक सतत प्रवाहमान चेतना है। इसीलिए मैं कहता हूँ कि *"हिन्दी तो चिर अविनाशी है।"*
*अविनाशी क्यों है हिन्दी*
क्योंकि संस्कृत उसकी जननी है और पाली-प्राकृत उसकी सहोदरा हैं। जिस भाषा की जड़ें वेदों तक जाती हों, वह नश्वर कैसे हो सकती है, इसलिये हिन्दी चिर अविनाशी है।
हिन्दी को मुगलों ने तलवार से दबाना चाहा, अंग्रेजों ने छल बल से अंग्रेजी थोपनी चाही, बाजारवाद ने अंग्रेजी-मिश्रित हिंग्लिश परोसी। परन्तु हिन्दी हर बार और अधिक तेजस्वी होकर उभरी। क्योंकि हिन्दी राजाश्रय से नहीं, *लोकाश्रय से जीवित है।* वह महलों में नहीं, खेत-खलिहान, चौपाल, माँ की लोरी और संतों की वाणी में बसती है। जो लोक में बसता है, वह अविनाशी होता है।
*हिन्दी की महिमा*
जो जोड़ती है, तोड़ती नहीं वह हमारी प्यारी भाषा हिन्दी है। हिन्दी की सबसे बड़ी महिमा है-उसकी *समावेशिता*।
हिन्दी ने अरबी-फारसी के शब्दों को गले लगाया जैसे -दिल, दुनिया, मोहब्बत।
हिन्दी में अंग्रेजी को भी अपनाया जैसे स्कूल, स्टेशन, डॉक्टर।
पर हिन्दी ने अपना स्वरूप कभी नहीं खोया।
यही ‘गंगा-जमुनी' संस्कृति है। हिन्दी कभी आक्रांता नहीं बनी, हिन्दी सदा *संगम* बनी। कबीर की साखी से लेकर प्रेमचंद के गोदान तक, गोस्वामी तुलसी दास के श्री रामचरितमानस से लेकर निराला की सरोज-स्मृति तक-हिन्दी ने हर वर्ग, हर भाव को अभिव्यक्ति दी।
आज विश्व में 100 करोड़ से अधिक लोग हिन्दी समझते-बोलते हैं। यद्यपि यह तीसरी सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा है, पर दिलों में पहले नंबर पर है।
*हिन्दी की गरिमा*
हिन्दी सदैव से ज्ञान और विज्ञान की भाषा है। यद्यपि भ्रम फैलाया गया कि हिन्दी में विज्ञान नहीं हो सकता। लेकिन यह नितान्त असत्य है।
*आचार्य सर जगदीश चंद्र बसु* ने विज्ञान हिन्दी में सोचा था।
*इसरो* के वैज्ञानिक आज भी आपस में हिन्दी में संवाद कर गर्व अनुभव करते हैं।
*तकनीक* ने भी तो हिन्दी को पंख दे दिए हैं। गूगल, व्हाट्सएप, एआई सब हिन्दी बोल रहे हैं।
हिन्दी की गरिमा उसके *शब्द-सामर्थ्य* में है। अंग्रेजी में 'अंकल' एक शब्द है। हिन्दी में चाचा, ताऊ, मामा, मौसा, फूफा आदि रिश्तों का पूरा मानचित्र है। यही संवेदनशीलता हिन्दी को महान बनाती है।
हिन्दी के प्रति हमारा कर्तव्य क्या है?
हिन्दी चिर अविनाशी तभी रहेगी, जब हम उसे व्यवहार में लाएँगे।
हम बच्चों को हिन्दी कहानियाँ सुनाएँ। पंचतंत्र, हितोपदेश आदि पढ़ने को प्रेरित करें।
कार्यालयों में हिन्दी में हस्ताक्षर करें और हिन्दी में ही सोचें।
केवल हिन्दी दिवस पर ही नहीं, प्रतिदिन हिन्दी को जिएँ, हिन्दी में जिएँ।
साधनों से नहीं, साधना से
इंसान महान बनता है,
भवनों से नहीं, भावना से
हर दिल जवान बनता है,
और भाषा तो केवल शब्द नहीं,
माँ के आँचल की छाया है,
हिन्दी तो चिर अविनाशी है,
यह भारत की आत्म काया है।
अंत में यही कि:
जब तक हिमालय रहेगा, गंगा बहेगी, और माँ अपने बच्चे को लोरी सुनाएगी, तब तक हमारी हिन्दी रहेगी। क्योंकि हिन्दी हमारी भाषा ही नहीं, *हमारे देश भारत का विश्वास है।*
*जय हिन्दी, जय भारत, जय माँ भारती!*
डॉ कर्नल आदिशंकर मिश्र
‘आदित्य’, ‘विद्यावाचस्पति’ ‘विद्यासागर’, लखनऊ
हिन्दी तो चिर अविनाशी है
हिन्दी तो चिर अविनाशी है
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