कलम संगिनी

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जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी

adi.s.mishra

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जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी

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जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी
*जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी* जननी एवं जन्मभूमि का सादर आदर स्वर्ग से भी बढ़कर किया जाता है, माता के गर्भ में रहकर शिशु पलता है, जन्मभूमि की गोद में शिशु बढ़ता है। "जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी", संस्कृत भाषा के प्रसिद्ध श्लोक का अन्तिम आधा भाग है, यह नेपाल का राष्ट्रीय ध्येयवाक्य है। यह श्लोक वाल्मीकि रामायण की पाण्डुलिपियों में दो रूपों में मिलता है। “मित्राणि धनधान्यानि प्रजानां संमतानिव, जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी।” यह प्रथम रूप उपरोक्त श्लोक 'हिन्दी प्रचार सभा मद्रास' द्वारा सम्पादित संस्करण में आया है, ऋषि भारद्वाज ने श्रीराम को सम्बोधित करते हुए कहा है। मित्र, धन्य, धान्यादि का संसार में बहुत अधिक सम्मान है। किन्तु माता और मातृभूमि का स्थान स्वर्ग से भी बढ़कर है। “अपि स्वर्णमयी लंका न मे लक्ष्मण रोचते। जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी॥” श्लोक के दूसरे रूप में श्रीराम भ्राता लक्ष्मण से कहते हैं, लक्ष्मण, यद्यपि यह लंका नगरी सोने की बनी है, परंतु इस पर भी इसमें मेरी कोई रुचि नहीं है। क्योंकि जननी और जन्मभूमि स्वर्ग से भी महान हैं। भारतवर्ष का पूरा गौरव इस संस्कृत श्लोक पर पूरा स्वाभिमान बसता है, रामायण के त्रेता युग से भी पहले से आर्यावर्त का सतयुग से इसका नाता है। धर्म सनातन, वैदिक हिंदू, ऋषियों, मुनियों, राम, कृष्ण के हम वंशज हैं, हर भारतवासी की रग रग में जननी, जन्मभूमि का स्वर्ग से ज़्यादा आदर है। पूरब से लेकर पश्चिम तक, उत्तर से लेकर दक्षिण तक, हिमगिरि की उत्तुंग शिखर से लेकर सागर की लहरों तक, गंगा, यमुना, सरस्वती, कावेरी, शिप्रा, नर्मदा, सतलज, झेलम, व्यास, बृहमपुत्र, गंगासागर में मिलती हैं। केदारनाथ, सोमनाथ, विश्वनाथ, वैद्यनाथ, रामेश्वर, त्रयंबकेश्वर, मल्लिकार्जुन, महाकालेश्वर, ओंकारेश्वर, भीमाशंकर, घृष्णेश्वर, नागेश्वर द्वादश ज्योतिर्लिंगों में ‘आदित्य’ साक्षात महादेव शिवशंकर जी बसते हैं। विद्यावाचस्पति डॉ कर्नल आदिशंकर मिश्र, ‘आदित्य’ लखनऊ

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