मन की बातें मन में ही रह गई
लब जो कह न सकी कभी आंखे ही कह गई
पर आंखों की भाषा वो पढ़ न सका कभी
अब वो अनकही चिठ्ठी आंखों से बह गई
बिछड़ना कहा मंजूर था मुझे उससे
किस्मत और वक्त की खराबी कहूं
तो यह गलत तो न होगा शायद
उसकी होना चाहती थी सदा सदा के लिए
यही तमन्ना मेरी पहली और आखिरी रह गई
अब तो वो अनकही चिठ्ठी आंखों से बह गई
एक बार कह पाती हिम्मत थोड़ी जुटा पाती
मेरा दिल उसका आशियाना उसके दिल की
मै ही रानी होती
रोक ही लेता एकबार हाथ जोरो से थाम लेता
तेरे बिन जीना मंजूर मुझे भी नहीं
एक बार आंखों आंखों में ही कह जाता
यह सुनने की मेरी तमन्ना दिल में ही रह गई
अब तो वो अनकही चिठ्ठी आंखों से बह गई
तेरी यादों में बितानी है जिनगानी
और तो और कहूं या करूं ही क्या
तेरे हाथों की लकीरों में न आ पाई,
रूठी किस्मत ने लिख दी जो जुदाई
तेरी अमिट छवि दिल में ही रह गई
जो प्रेम की चिठ्ठी पढ़ न सका आंखों में मेरे
वो अनकही चिठ्ठी न जाने कब आंखों से बह गई
अनकही चिट्ठी:
अनकही चिट्ठी:
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