कलम संगिनी

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भावपल्लवन- श्रद्धया देयम्। अश्रद्धया अदेयम्।

भावपल्लवन- श्रद्धया देयम्। अश्रद्धया अदेयम्।

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भावपल्लवन- श्रद्धया देयम्। अश्रद्धया अदेयम्।
भावपल्लवन श्लोक: “श्रद्धया देयम्। अश्रद्धया अदेयम्।” भावार्थ – श्रद्धा से दान देना चाहिए; बिना श्रद्धा का दान निष्फल है। (तैत्तिरीयोपनिषद् १.११.४) तैत्तिरीयोपनिषद् (१.११.४) में उल्लिखित यह श्लोक दान और श्रद्धा के गहन संबंध को स्पष्ट करता है। इसका संदेश है कि दान केवल तभी सफल और पुण्यदायक होता है जब उसमें सच्ची श्रद्धा और भक्ति निहित हो। केवल बाह्य रूप से दिया गया दान या दिखावे के लिए किया गया दान निष्फल रहता है। यह श्लोक कर्म के मूल्य को उसके भाव, मनोबल और निष्ठा से जोड़कर समझाता है। इसका उद्देश्य यह है कि व्यक्ति दान और अन्य धर्मकर्मों को केवल क्रियात्मक रूप से न करके, हृदय और मन से समर्पित होकर करें। शब्दार्थ श्रद्धया – श्रद्धा, विश्वास और निष्ठा के साथ। देयम् – दिया जाने योग्य, अर्थात पुण्यदायक और स्वीकार्य। अश्रद्धया – बिना श्रद्धा के। अदेयम् – न दिया जाने योग्य, निष्फल। सच्ची श्रद्धा और भावनात्मक निष्ठा के साथ किया गया दान न केवल स्वीकार्य होता है, बल्कि व्यक्ति के आत्मिक विकास और पुण्य-संचय का स्रोत भी बनता है। बिना श्रद्धा का दान केवल बाह्य क्रिया बनकर रह जाता है और इसका आध्यात्मिक लाभ नहीं होता। उपनिषद का यह श्लोक स्पष्ट करता है कि दान का वास्तविक उद्देश्य केवल वस्तु देना नहीं, बल्कि हृदय परिवर्तन, पुण्य अर्जन और आत्मिक शुद्धि है। श्रद्धा दान और अन्य कर्मों की ऊर्जा का मूल स्रोत है। यह कर्म में स्थिरता, ईमानदारी और पूर्ण मनोबल लाती है। श्रद्धा से दान केवल वस्तु देने तक सीमित नहीं रहता, बल्कि इसमें ज्ञान, समय, सेवा और साधना का योगदान भी शामिल होता है। श्रद्धा-युक्त दान व्यक्ति के लिए आंतरिक लाभ और पुण्य का स्रोत बनता है तथा समाज में सकारात्मक प्रभाव और प्रेरणा भी उत्पन्न करता है। इसके विपरीत, अश्रद्धा से किया गया दान स्थायी लाभ नहीं देता और केवल दिखावे या सामाजिक मान तक सीमित रह जाता है। श्लोक यह भी सिखाता है कि कर्म, भक्ति और श्रद्धा का समन्वय अत्यंत आवश्यक है। श्रद्धा के बिना कर्म में स्थायित्व और ऊर्जा नहीं रहती, जिससे न केवल दान का उद्देश्य अधूरा रह जाता है, बल्कि व्यक्ति का आत्मिक विकास भी प्रभावित होता है। जीवन में इसका अनुप्रयोग दान, सेवा और अन्य धर्मकर्मों में श्रद्धा की भूमिका को स्पष्ट करता है। अन्य धर्मग्रंथ भी इसी विचार का समर्थन करते हैं। जैसे- छांदोग्योपनिषद् (८.७.१) कहता है कि केवल श्रद्धा और भक्ति से किए गए कर्म का फल मिलता है। भगवद्गीता (१७.९) में तीन प्रकार के दान—सात्त्विक, राजसिक और तामसिक बताए गए हैं और केवल सात्त्विक दान ही पुण्यदायक होता है। मनुस्मृति और महाभारत में भी दान और श्रद्धा के आपसी संबंध पर बल दिया गया है। इस प्रकार, तैत्तिरीयोपनिषद् का यह श्लोक यह सिखाता है कि दान का मूल्य केवल बाह्य क्रियाओं से नहीं, बल्कि हृदय, भावना और श्रद्धा से निर्धारित होता है। जीवन में कर्म, भक्ति और श्रद्धा का समन्वय आध्यात्मिक और सामाजिक संतुलन का आधार है। ✍️ योगेश गहतोड़ी "यश" (ज्योतिषाचार्य) मोबाईल: 9810092532 नई दिल्ली -110059

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