रचना - स्वरचित मौलिक
शीर्षक - नरी के अल्फ़ाज़
'नरी हूं मैं ममत्व हूं,गोद विशेष है।
बलिदानों से परिपोषित में, में नरी विशेष हूं।
हे सादगी मेरी यही, संस्कार मेरा है।
उड़ती फिरूं नभ तल में, आसमां मेरा है।
इज्ज़त मेरी सपना मेरा, किरदार अशेष है।
हूं मां पत्नी बेटी, रुपों में विशेष हूं।
बच्चों के लिए अपने,सपने भूल जाती है।
परिवार वास्ते वो ,गम भी सह जाती है।
हर पीड़ा वो हंसकर, यूंही सह जाती है।
हर दर्द में बच्चों को,मां हंसकर दिखाती है।
कमजोर ना होने दिया,ऐसे बन्धकर रखा।
चरित्र हो या नाम हो,सहज कर रखा।
लेखिका कवि-नीतू धाकड़ (अम्बर)
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