साहित्य - सृजन का शौक है
हम जानते हैं कि अब कलयुग
अपने चरम की ओर अग्रसर है,
इसीलिए आदमियों, जानवरों के
बीच फर्क कम होता जा रहा है।
अब तर्क इंसान की तरह दें,
वितर्क जानवर की तरह दें,
दोनों बात में कोई फर्क नहीं,
सभी अपने को ठहराते हैं सही।
सही मौके पर खड़े होकर
बोलना तो एक साहस है, खामोशी से बैठकर दूसरों
को सुनना भी एक साहस है।
हास परिहास की जगह पर,
तीखी - तीखी नोकझोंक है,
अवसर मिल जाये अगर तो,
पिता को भी छोड़ना नहीं है।
साहित्य सृजन का शौक है,
हास्य - व्यंग्य भी लिखते हैं,
कोई और बर्दाश्त नहीं होते हैं,
कुत्तों सी भोंक भोंक करते हैं।
आदित्य बनते कवि सूरदास तुलसी, केशवदास, हरिऔध हैं,
वास्तव में तेज सूर्य के प्रकाश में
चमकते बस जुगनू जैसे ही हैं।
डा. कर्नल आदि शंकर मिश्र
‘आदित्य’, ‘विद्यावाचस्पति’
लखनऊ:28 अगस्त 2025
साहित्य-सृजन का शौक है
साहित्य-सृजन का शौक है
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