कलम संगिनी

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अब सिर्फ़ सांसें गिनता हूं

HARNARAYAN KURREY

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1 Followers 93 Posts Oct 2025

अब सिर्फ़ सांसें गिनता हूं

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अब सिर्फ़ सांसें गिनता हूं
शिर्षक: अब सिर्फ़ साँसें गिनता हूं विधा -कविता श्रेणी -जीवन मौलिक रचना रचनाकार -कौशल तुम चली गईं तो मेरा नाम भी मेरे साथ नहीं रहा लोग पूछते हैं—“कौन हो तुम?” मैं चुप रहता हूँ क्योंकि जवाब देने के लिए तेरी आँखों की ज़रूरत पड़ती है चाय का प्याला अब भी दो रखता हूँ दोनों ठंडे हो जाते हैं मैं फिर भी दोनों को होंठों से लगाता हूँ एक में तेरी साँसें ढूँढता हूँ दूसरे में वो किस्मत को कोसता हूँ जिसने तुझे मुझसे पहले बुला लिया रातें अब मेरे गले पड़ती हैं हर घंटा एक सदी की तरह मैं तकिए को सीने से चिमटाए रहता हूँ जैसे कोई माँ मृत बच्चे को गोद में लिए रोती रहती है और दुनिया कहती है—“सो जाओ” तेरे जाने के बाद मैंने कैलेंडर फाड़ दिया तारीखें अब दर्द की गिनती करती हैं हर सुबह एक और लाश उठती है मेरे भीतर जिसे मैं दफनाने की बजाय अपने सीने में ही दफन रखता हूँ मैंने आईना नहीं तोड़ा अब उससे बातें करता हूँ पूछता हूँ—“बता, मैं अभी ज़िंदा हूँ न?” वो चुप रहता है शायद उसे भी यकीन नहीं कि जिसके सीने में तेरा नाम धड़कता था उसका सीना अब भी धड़क रहा है अब सिर्फ़ साँसें गिनता हूँ एक... दो... तीन... हर साँस फटी हुई आवाज़ में कहती है “वापस आ जा...” पर वापस आने का रास्ता तेरे साथ ही चला गया मैं अभी भी उसी मोड़ पर खड़ा हूँ जहाँ तूने आखिरी बार पीछे मुड़कर देखा था हवा अब भी वही है पर उसमें तेरी खुशबू नहीं फिर भी मैं सूँघता रहता हूँ जैसे कोई पागल खाली बोतल को सूँघकर शराब की उम्मीद करता है कभी-कभी बच्चे पूछते हैं—“अंकल, आप रो क्यों रहे हो?” मैं मुस्कुराकर कहता हूँ—“धूल चली गई आँख में” पर सच तो ये है कि मेरी आँखों में अब धूल नहीं तेरा खाली जगह रो रहा है हे प्रभु अगर फिर मिलना है तो इस जनम में ही मिला दे वरना अगले जनम में मैं फिर तुझसे मिलने से पहले मर जाना चाहूँगा ~ कौशल

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