कलम संगिनी

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पर परिंदों पर ही अच्छे लगते हैं

adi.s.mishra

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पर परिंदों पर ही अच्छे लगते हैं

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पर परिंदों पर ही अच्छे लगते हैं
पर परिंदों पर ही अच्छे लगते हैं यह वक्त वक्त की ही बात है कि, जब होता है तो काटे नहीं कटता, और जब नहीं होता है वक्त अपना, तब साथ देने वाला कोई नहीं होता। पर परिंदों पर ही अच्छे लगते हैं, क्योंकि इंसान के पर निकलते ही, उसके अहंकार में वृद्धि हो जाती है, इंसान की बर्बादी शुरू हो जाती है। परिंदे तो अपने परों की शक्ति और उन्हीं परों के भरोसे ऊँची उड़ान भरते हैं, पर इंसान की ऊँची उड़ान उसकी ऊँची सोच और उसकी इंसानियत पर निर्भर है। काश! मैं समाज व देश के लिये ऐसा कुछ कर पाऊँ या किसी काम आऊँ, दुनिया में जीने की सीधी सच्ची सी सुगम और सरल राह पर चल पाऊँ। अंतर्मन मेरा बिलख रहा दुनिया की अब ऐसी दुर्दशा देख देख, सामाजिक ताना बाना ध्वस्त और बिखरता हुआ देख देख। जीवन का एक पहलू ये भी है, कि निखरता वही है जीवन में, जो पहले बिखर चुका होता है, स्वर्णकणों से ही गहना बनता है। मैं कर सकता हूँ, यह विश्वास है, आदित्य यही आत्मविश्वास है, परंतु केवल मैं ही कर सकता हूँ, यह अंध विश्वास है, अहंकार है। डा. कर्नल आदि शंकर मिश्र ‘आदित्य’, ‘विद्यावाचस्पति’ लखनऊ

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