काव्य
भ्रम के बादल
भ्रम की लहरें जब मन को घेरती हैं,
शांति की राहें दूर दूर भटकती है।
वक्त के बादल जब छा जाते हैं,
सपनों के दीप भी बुझ जाते हैं।
अंतर्मन की भ्रम से हो रहा विचलित मन ,
भ्रम के बादल से हो रहा अशांत मन।
मन की व्यथा का नहीं कोई मोल,
हर हँसी के पीछे होता है अंतर्मन में शोल।
भ्रम की लहरें मन को घेरें,
शांत हृदय भी हलचल घेरे।
पर इक किरण दिल को समझाती,
हर अंधियारा पल बीत ही जाती।
चल ए मन, अब हार न मान,
हर तूफ़ां के बाद है अरमान।
पर आशा की किरण फिर मुस्कुराती है,
अंधेरों के पार नई भोर लाती है।
स्वरचित काव्य
श्रीमती प्रतिभा दिनेश कर
विकासखंड सरायपाली
जिला महासमुंद छत्तीसगढ़
भ्रम के बादल
भ्रम के बादल
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