कलम संगिनी

कलम संगिनी

प्रभु की निराली रीति, नीति

adi.s.mishra

adi.s.mishra

3 Followers 174 Posts Aug 2025

प्रभु की निराली रीति, नीति

40 Views
0 Likes 0 Comments
0 Saves
0 Shares
प्रभु की निराली रीति, नीति
प्रभु की निराली रीति नीति जाने किस बात पर रीझ जाते हैं धनुर्धारी। जाने कब और कहां चले आते हैं बनवारी। कभी माता शबरी के बेर पर लुभा गए। कभी विदुर जी के साग ही मन को भा गए। कभी छिलके का ही भोग लगा लिये, कभी सुदामा जी के सूखे चावल, को ही प्रसाद बना लिए। ऐसी होती है लीला धारी की लीला न्यारी, जाने किस बात पर रीझ जाते हैं धनुर्धारी। गजराज को बचाने पैदल ही आ गए, भक्त प्रहलाद के लिए खंभे से प्रगट हो गए। बहन द्रौपदी की लाज बचाने हेतु साड़ी के तार तार में समा गए। भक्त की आन रखने को रथ का चक्का ही उठा लिए। अपना मान रहे न रहे भक्त का मान बचा लिए। ऐसे होते हैं प्रभु दीनबंधु दीनानाथ सेवक सुखकारी। जाने किस बात पर रीझ जाते हैं गिरधारी। जग में होती है स्वार्थ की रीति केवल परमात्मा ही निभाते हैं निस्वार्थ प्रीति। अपने जन को अपने भक्तों को सदा प्रसन्न प्रफुल्लित रखते हैं। संसार के रंगमंच पर नाना प्रकार रूप धरते हैं। ऐसे होते हैं आनंद सिंधु सज्जन संत हितकारी। जाने किस भाव पर रीझ जाते हैं धनुर्धारी। जाने किस रूप में दर्शन दे देते हैं बनवारी।। कवियित्री सुभद्रा द्विवेदी, ‘विद्यावाचस्पति’, लखनऊ

Comments (0)

Click to view
Footer