कलम संगिनी

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शांति की तलाश में युद्ध के विकल्प में अशांत होता विश्व समुदाय

adi.s.mishra

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शांति की तलाश में युद्ध के विकल्प में अशांत होता विश्व समुदाय

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शांति की तलाश में युद्ध के विकल्प में अशांत होता विश्व समुदाय
*शांति की खोज में अशांत होता विश्व* आज विश्व शांति की खोज में लगातार अशांत होता जा रहा है, क्योंकि विश्व में राजनीतिक संघर्ष, आर्थिक प्रतिस्पर्धा और वैचारिक मतभेद विनाशकारी युद्धों को जन्म दे रहे हैं। बमों और मिसाइलों से शांति स्थापित करने की कोशिशें केवल मानवता को नष्ट कर रही हैं, जबकि वास्तविक समाधान आपसी संवाद, विश्व बन्धुत्व के सिद्धांत, परस्पर बराबरी व भाईचारे और आंतरिक शांति के माध्यम से ही संभव है। युद्ध के माध्यम से शांति प्राप्त करने के विरोधाभास का विश्लेषण में अशांत विश्व की स्थिति पैदा हो रही है। आज दुनिया में विभाजन, संघर्ष और मतभेद परिवारों से लेकर वैश्विक मंच तक व्याप्त हैं। महाशक्तियाँ अप्रत्यक्ष रूप से कूटनीतिक और तकनीकी युद्ध (जैसे- वायरस, साइबर हमले) लड़ रही हैं। युद्ध की यह विभीषिका केवल विनाश ला रही है, जिसमें नैतिकता और मानवता खत्म होती जा रही है। युद्ध शांति नहीं, बल्कि विनाश का मार्ग है, जैसा कि विभिन्न संघर्ष क्षेत्रों में देखा जा सकता है। शांति की सही परिभाषा में केवल युद्ध की अनुपस्थिति ही नहीं है, बल्कि यह एक रचनात्मक प्रक्रिया है। असली शांति वार्तालाप, समझदारी और आपसी सहयोग से आती है, न कि हथियारों से। आंतरिक शांति का महत्व में भी विश्व शांति की शुरुआत व्यक्तिगत स्तर पर, यानी मन की शांति से होती है। जब तक हम अपने मन के युद्ध (क्रोध, लालच) को नहीं जीतते, बाहरी दुनिया में शांति स्थापित करना कठिन है। इस ओर समाधान स्वरूप शांति स्थापित करने के लिए संघर्ष के बजाय संवाद और सहिष्णुता बहुत आवश्यक होती है। हमें युद्ध के बजाए सामूहिक रूप से विकास और सहयोग पर ध्यान केंद्रित करने की जरूरत है। इस विषय पर प्रस्तुत है मेरी एक कविता: भयावह युद्ध विभीषिका युद्ध की विभीषिका में युवा सैनिक, जिसे जानते नहीं उसे जान से मारते हैं, वे न उसे प्रेम करते हैं न घृणा करते हैं, बस किसी का बर्बर आदेश मानते हैं। और ऐसे बर्बर आदेश देने वाले उम्र दराज़ शासक ही होते हैं, वे एक दूसरे को क्या सारी दुनिया के ऐसे ही उम्र दराज़, व अपने निहित स्वार्थ में दुश्मन बनाकर उनसे घृणा करते हैं, उन जवानो को जान से मारने का वे ही नृशंस आदेश देते हैं। ताकतवर देश पड़ोसी देशों को अपनी शर्तों पर चलाना चाहता है, शर्तों के साथ ही युद्ध विराम करने की बात की बात भी वही करता है। उन्हें मानवता का आभाष नहीं है, ऐसा कोई भी कह नहीं सकता है, निर्दोष सैनिकों को ही नहीं,नागरिकों व विदेशियों को भी मरवा सकता है। दुनिया के भविष्य छात्र, आजीविका अर्जन के लिए दूर देश के उद्यमी एवं उस देश में फँसे निर्दोष विदेशी लोगों की भी आक्रांता परवाह नहीं करता है। कई ताकतवर देश या देशों के समूह कमजोर छोटे सीमांत देशी को इसी स्वार्थ में अपने साथ रखना चाहते हैं, और अपने स्वार्थ में दबाव बनाते हैं। सारे वैश्विक नियम क़ानून व क़ायदे ऐसी ताकतवर महाशक्तियाँ भूलकर अपनी अपनी शर्तों पर सम्पूर्ण जगत को युगों तक बंधक बना रखते हैं। विश्व बंधुत्व का सिद्धांत उनकी ताक़त को स्वीकार नहीं होता है, मानव मानवता का दुश्मन बनकर, मानवता के विनाश को तत्पर होता है। विज्ञान व तकनीकी विकास विश्व संस्कृति के विनाश को आज उद्यत है, धर्म संस्कृति व सामाजिक ताना बाना, आदित्य युद्ध विभीषिका में भ्रमित है। डॉ कर्नल आदिशंकर मिश्र ‘आदित्य’, ‘विद्यावाचस्पति’ लखनऊ: 07 मार्च 2026

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