कलम संगिनी

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मृत्यु की नदी

HARNARAYAN KURREY

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मृत्यु की नदी

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मृत्यु की नदी
रचनाकार -हरनारायण कुर्रे शिर्षक **मृत्यु की नदी** विधा- काव्य, श्रेणी - जीवन मृत्यु की नदी, काली जलधारा, अज्ञात तट की ओर बहती अनवरत। किनारों पर जीवन के फूल मुरझाए, सपनों की नावें डूबतीं, चीखें दबी। कभी शांत प्रवाह, लुभाती चुप्पी में, कभी उफनती भंवर, डरावनी गहराई। यम की नौका, चुपचाप बुलाती, हर जीव को लीलती, बिना भेदभाव। बचपन की मासूम हँसी यहाँ थमे, यौवन का जोश, परिपक्वता का फल। सभी बूँदें मिलतीं अंतिम सागर में, जहाँ न जन्म, न मृत्यु, बस शून्य का वास। नदी के जल में झलकते संस्मरण, पुरानी बातें, अधूरी इच्छाएँ। परिवार की पुकार, मित्रों का शोक, सब बह जाते, लहरों की गोद में। हे मृत्यु! तू नदी सी अनिवार्य यात्रा, जीवन की सीमा, अंत का द्वार। डरना व्यर्थ, बहना ही तो भाग्य, नदी पार होकर मिले अमर शांति। कभी चाँदनी नहाती इसकी सतह पर, रात्रि की परछाईं में रहस्य छिपे। सूर्योदय न आता यहाँ कभी, बस अंधकार का राज, अनंत गहरा। जीवन की नदी से यह मिलती अंत में, दो धाराएँ एक होकर विलीन। मृत्यु न अंत, नई यात्रा का प्रारंभ, नदी के पार, नया जन्म का संकेत। तो आओ, नाव सजाओ हिम्मत से भरी, मृत्यु की नदी को पार कर लें। हर लहर में छिपा है जीवन का सार, बहते रहो, डर न पकड़ो किनार।। ======================== मृत्यु को नदी के रूपक से जीवन के अंत और परे की यात्रा के रूप में चित्रित किया। ========================= मुड़पार चु, पोस्ट रसौटा, तहसील पामगढ़, जिला जांजगीर चांपा, छत्तीसगढ़

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