कलम संगिनी

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*म्लेक्षता* (स्वरचित कहानी)

*म्लेक्षता* (स्वरचित कहानी)

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*म्लेक्षता* (स्वरचित कहानी)
*विषय: म्लेक्षता* (स्वरचित कहानी) पंचपातक का दूसरा आयाम "म्लेक्षता" केवल भाषा की अशुद्धि नहीं, बल्कि आत्मा की असंवेदनशीलता और चेतना की मलिनता का प्रतीक है। जब मनुष्य अपनी संस्कृति, सत्य और मूल्यों से दूर होता है, तब वह म्लेक्षता के आकर्षक परंतु विनाशकारी दलदल में उतरने लगता है। यह भीतर के भ्रम और अविवेक से उत्पन्न धूल है, जो चेतना के प्रकाश को ढँक देती है। आधुनिकता के नाम पर यह व्यक्ति को सभ्यता का आवरण तो देती है, पर भीतर से उसे रिक्त कर देती है। परिणामतः शुद्धता उपहास का विषय बनती है, कृत्रिमता जीवन का अंग और यही आत्मविस्मृति समाज को पतन की ओर ले जाती है। अत: *“म्लेक्षता वह है, जहाँ आत्मा मौन और बाह्य शोर मुखर हो जाता है।”* म्लेक्षता पर कहानी इस प्रकार है — उत्तराखण्ड के अल्मोड़ा जिले में “आर्यता” नाम का एक गाँव है। इस दीपावली में इस गाँव के बच्चे, जो शहरों में अपना जीवन-यापन कर रहे थे, त्यौहार के अवसर पर कुछ लोग सपरिवार गाँव आए। इस गाँव में कई ग्रामीण देवताओं के मंदिर हैं, त्यौहारों पर गाँव के लोग इन मंदिरों में पूजा-पाठ और धूप-बत्ती करते हैं, परन्तु इन बच्चों ने गाँव की इस संस्कृति को पहले कभी न देखा था। वे बिजली की जगमग, आतिशबाज़ी और कृत्रिम रोशनी के अभ्यस्त थे। जब उन्होंने देखा कि बुज़ुर्ग मिट्टी के दीपक जलाकर आरती कर रहे हैं, तो कुछ हँसे, कुछ उदासीन रहे। यही वह क्षण था जब “म्लेक्षता” की पहली झलक दिखाई दी। आधुनिकता की चकाचौंध में जड़ों से दूर होती मानसिकता। वे न तो उन परंपराओं को और न ही उनकी आत्मीयता को समझ पा रहे थे। गाँववालों को लगा कि अब संस्कारों की लौ मंद पड़ने लगी है, क्योंकि जब अपनी संस्कृति अपने ही बच्चों को पराई लगने लगे, तो समझो म्लेक्षता ने मन में घर बना लिया है। “आर्यता” गाँव के चार-पाँच परिवार, जो कई वर्षों से शहरों में बस गए थे, दीपावली पर जब लौटे तो बोले — “अब गाँव को भी बदलना चाहिए, यह पुराना ढंग नहीं चलेगा।” उन्होंने कहा कि अब “पैलाग” की जगह “हाय”-“हेलो” और “फिर मिलेंगे” की जगह “बाय-बाय” कहा जाना चाहिए। यहाँ तक कि बड़ों को “पैलाग” (प्रणाम) करने की परंपरा को उन्होंने “ओल्ड फैशन” कहकर हँसी का विषय बना दिया। कुछ ही दिनों में इन परिवारों ने गाँव में एक अजीब-सा भय और असहजता का माहौल फैला दिया। अब गाँव की मिट्टी में भी परफ्यूम की गंध आने लगी थी। यह सब म्लेक्षता की प्रारंभिक लहर थी, जो आधुनिकता के आवरण में धीरे-धीरे भीतर प्रवेश कर रही थी। शहर से आए युवक बुजुर्गों के सामने ही खुलेआम शराब और सिगरेट पीने लगे और गाँव का वातावरण एकदम बदल गया। म्लेक्षता ने भाषा के माध्यम से पहला प्रहार किया। शब्द बदले तो भाव बदले और भाव बदले तो विचार भी बदल गए। बुजुर्ग मौन हो गए, क्योंकि नई पीढ़ी उन्हें “आउटडेटेड” कहने लगी। म्लेक्षता ने अपने पाँव चुपचाप जमा लिए थे और किसी को इसका आभास तक नहीं हुआ कि यह परिवर्तन केवल शब्दों का नहीं, बल्कि आत्मा के क्षरण का संकेत था। धीरे-धीरे “आर्यता” गाँव की वाणी, संस्कृति, भक्ति और भोजन सब म्लेक्षता से आक्रांत हो गए। जहाँ पहले पहाड़ी लोकगीतों की मधुर ध्वनियाँ गूँजती थीं, वहाँ अब फ़िल्मी गीतों का शोर सुनाई देने लगा। जो गाँव कभी प्रातःकालीन भक्ति-भजन से जागता था, वहाँ अब बच्चे मंदिरों में जूते पहनकर केवल फोटो खिंचवाने जाते थे। घर का सादा भोजन उन्हें “गँवारों का खाना” लगने लगा, जबकि बाहर का पिज़्ज़ा-बर्गर “शुद्ध” कहे जाने लगे। भोजन की सात्त्विकता का स्थान स्वाद ने ले लिया और जीवन के हर कोने में म्लेक्षता की कृत्रिमता फैल गई। जो सरल था, वह “बोरिंग” कहा जाने लगा; जो अशुद्ध था, वही “स्टाइलिश” कहलाया। म्लेक्षता ने धर्म को भी फैशन बना दिया — मंदिर अब भक्ति के नहीं, प्रदर्शन के मंच बन गए। “आर्यता” गाँव में सत्यपाल नाम के एक बुजुर्ग रहते थे। वह शांत, विद्वान, धार्मिक और सरल स्वभाव के संयमी व्यक्ति थे। वे प्रतिदिन मंदिरों की सफ़ाई करते, धूप-बत्ती जलाकर पूजा करते और ईश्वर के प्रति समर्पण को जीवन का आधार मानते थे। उनके लिए धर्म केवल विचार नहीं, बल्कि आचरण की शुद्धता का स्वर था। परंतु दीपावली के अवसर पर जब उन्होंने गाँव में यह अजनबी-सा माहौल देखा, तो उन्हें गहराई से अनुभूति हुई कि आस्था अब दिखावे में बदल चुकी है। दु:खी मन से सत्यपाल बोले — “गाँव में यह म्लेक्षता अब केवल शब्दों की नहीं, आत्मा की बीमारी बन चुकी है।” उन्होंने अनुभव किया कि यह म्लेक्षता भीतर की श्रद्धा और विवेक दोनों को निगल रही है। म्लेक्षता के इस विषाक्त वातावरण में सत्य, संयम और संस्कार उपहास का विषय बन चुके थे। जहाँ कभी “जय श्रीराम” की गूँज थी, वहाँ अब “डिस्को सॉन्ग” का शोर था। सत्यपाल समझ गए कि यदि इस प्रवृत्ति को रोका नहीं गया, तो संस्कृति की जड़ें सूख जाएँगी, क्योंकि म्लेक्षता स्मृति मिटाती है और स्मृति ही पहचान होती है। उसी क्षण उन्होंने निश्चय किया कि यह संघर्ष बाहरी नहीं, बल्कि आत्मा के पुनर्जागरण का भीतरी युद्ध है, जिसे अब उन्हें स्वयं प्रारंभ करना होगा। एक दिन सायंकाल के समय सत्यपाल मंदिर में धूप-बत्ती करने पहुँचे तो देखा कि गाँव के कुछ बच्चे मंदिर के सामने धूम्रपान कर रहे हैं। उन्होंने शांत स्वर में कहा — “बच्चो, यह देवस्थान है, यहाँ संयम रखो।” परंतु सभी हँस पड़े। एक ने व्यंग्य से कहा — “अब वो पुराना ज़माना नहीं बाबा, हम मॉडर्न हैं।” यह सुनकर सत्यपाल के हृदय में मानो वज्र प्रहार हो गया। उन्हें लगा कि यह धर्म का नहीं, श्रद्धा का अपमान है। देर तक वे सोचते रहे — *“क्या यही म्लेक्षता है? जब पवित्रता उपहास बन जाए?”* उसी रात उन्होंने संकल्प लिया कि वह इस अंधकार को ज्ञान की ज्योति से मिटाएँगे, चाहे यह युद्ध अकेले ही क्यों न लड़ना पड़े। अगली सुबह सत्यपाल गाँव के नौले (कुआँ) पर स्नान करने गए। नहाते-नहाते उनके होंठों से सहज ही निकला — *“सत्यमेव जयते नानृतम्।”* उन्हें अनुभूति हुई कि म्लेक्षता का प्रतिकार क्रोध से नहीं, करुणा से करना होगा। लौटकर उन्होंने बच्चों को संस्कृत सिखाना शुरू किया, ताकि शब्दों की शुद्धता से विचारों में फिर से पवित्रता लौट सके। वे प्रतिदिन बच्चों को ‘ओंकार’ का अर्थ समझाते और उस एकाक्षर में निहित सत्य का बोध कराते। उनका मौन कर्म ही उपदेश बन गया। धीरे-धीरे गाँव के लोग उनके पास आने लगे, बच्चों ने नशा छोड़ दिया और माता-पिता के चरण स्पर्श कर क्षमा माँगने लगे। जैसे एक दीपक के जलते ही अंधकार पीछे हट जाता है, वैसे ही सत्यपाल की चेतना से “आर्यता” गाँव में म्लेक्षता का अंधकार विलीन होने लगा। धीरे-धीरे “आर्यता” गाँव में परिवर्तन की लहर फैलने लगी। अब बच्चे फिर से “प्रणाम” कहकर बड़ों के चरण छूने लगे, स्त्रियाँ संध्या में दीप जलाने लगीं। आँगन में तुलसी के पौधे फिर से लहराने लगे और गलियों में पुराने भजन गूँजने लगे। यह आत्मशुद्धि का जागरण था। लोगों को लगा मानो म्लेक्षता का विष उनके जीवन से निकल रहा हो। सत्यपाल बोले — *“संस्कार ही संस्कृति का प्राण हैं, इन्हें जीवित रखो, यही जीवन की शुद्ध श्वास हैं।”* गाँव के बुजुर्ग प्रसन्न होकर बोले — “हमारा ‘आर्यता’ गाँव फिर से अपने संस्कारों में लौट आया है।” अभी भी कुछ युवक सत्यपाल का उपहास उड़ाते हुए कहते थे — “यह सब दिखावा है, अब वेद पढ़कर क्या मिलेगा? गाँव के लोग हमारा सम्मान तो अभी भी नहीं करते।” तब सत्यपाल मुस्कराकर बोले — “जब आत्म-सम्मान को म्लेक्षता छीन लेती है, तो सम्मान मिलेगा कैसे? संस्कृति कोई बंधन नहीं, बल्कि अनुशासन है; जो स्वतंत्रता को दिशा देता है।” यह बात उन बच्चों के मन में गहराई से उतर गई, और जो पहले सत्यपाल का मज़ाक उड़ाते थे, वे अब उनके शिष्य बन गए। उन्हें यह बोध हुआ कि “संस्कार से रहित प्रगति” केवल विनाश का दूसरा नाम है और म्लेक्ष रहित वातावरण में ही आत्म-सम्मान का वास्तविक अनुभव मिल पाता है। एक दिन सत्यपाल ने गाँव के सभी लोगों को मंदिर में एकत्र किया और कहा — “म्लेक्षता का अर्थ केवल वाणी की कटुता नहीं, वह आत्म-विस्मृति है। जब मनुष्य अपनी भाषा भूलता है, तो अपनी सोच भी खो देता है और जब वह परंपरा का उपहास करता है, तो अपने ही भविष्य से विमुख हो जाता है।” उनके शब्दों ने गाँव को जागृत कर दिया। उसी दिन हर आँगन में तुलसी रोपी गई, हर मंदिर में दीप प्रज्वलित हुए और मौन भक्ति की ध्वनि पुनः गूँज उठी। “आर्यता” गाँव ने संस्कार, शुद्धता और आत्मबोध का प्रतीक बनकर अपनी पहचान पुनः पा ली। अतः म्लेक्षता को निम्न श्लोकों से समझा जा सकता है — *म्लेक्षता न केवल वाचा, न केवल वसन-विकारः।* *आत्मविस्मृतिजा मूढा, चेतनाच्छादिनी तमा॥* अर्थात म्लेक्षता केवल भाषा या वस्त्रों की विकृति नहीं है, वह आत्म-विस्मृति से उत्पन्न मूढ़ता है, जो चेतना के प्रकाश को ढँक देती है। *शब्दशुद्ध्या मनःशुद्धिः, संस्कारेण प्रकाशिता।* *यत्र विनयः पुनर्जातः, तत्र म्लेक्षता गताः॥* अर्थात जब शब्द शुद्ध होते हैं, तो मन भी शुद्ध हो जाता है; संस्कार से चेतना में प्रकाश फैलता है। जहाँ विनम्रता लौट आती है, वहाँ म्लेक्षता सदा के लिए मिट जाती है। *“आर्यता" गाँव अब केवल स्थान नहीं, बल्कि म्लेक्षता से रहित सनातन चेतना का प्रतीक गाँव बन गया।* 🙏 योगेश गहतोड़ी "यश" नई दिल्ली - 110059 मोबाईल: 9810092532

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