कलम संगिनी

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*शून्य में सजीव – गुरु का उपहार*

*शून्य में सजीव – गुरु का उपहार*

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*शून्य में सजीव – गुरु का उपहार*
*शून्य में सजीव – गुरु का उपहार* शून्य था वह—न नाम, न रूप, न कोई भी आकार था, शांत तरंगों में डूबा, बस स्वयं का ही विचार था। न दिन उगा था, न रजनी आई, न कोई भी रेखा बनी, वहाँ जो था, बस मौन था—न आदि, न अंत की गिनती थी कहीं। तभी किसी सुगंध-सी, गुरु-वाणी बहकर आई, जैसे चिर-संचित तृषा को पहली बूँद तृप्ति दे पाई। वो बोले—"जहाँ कुछ भी नहीं, वहीं से सब कुछ जन्मता है, उस शून्य में ही सजीव ब्रह्म, तुम्हारे भीतर थमता है।" गुरु ने न आँखें खोलीं, न कोई चमत्कार किया, बस मौन के मध्य बैठ, जीवन का विस्तार दिया। शब्दरहित उपदेशों से, उन्होंने मुझको मुझे दिखाया, 'मैं' जो था भ्रमित धूप-सा, ‘तत्’ की छाँव में बसाया। न मैं रहा, न मेरा रहा—सब कुछ उन्हें समर्पित है, अब जो देखूँ—वो गुरुकृपा का ही अनन्त दृश्य चित्रित है। शून्य अब खाली नहीं रहा, उसमें चैतन्य नाच रहा है, हर अणु में उनका आशीष, हर प्राण में दीपक जाग रहा है। मैं जो था, मिट चुका हूँ; अब जो हूँ—वो उनका दान है, गुरु ने दे दिया मुझे ही—यह साक्षात् ब्रह्म-विधान है। शून्य में अब सजीव हूँ मैं—और यही है सच्चा उपहार, गुरु ने कर दिया मुक्त मुझे—मेरे ही बंधन से इस बार। 🙏 योगेश गहतोड़ी "यश" नई दिल्ली - 110059 मोबाईल: 9810092532

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