कलम संगिनी

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ईद उल अझा का एक पैग़ाम

adi.s.mishra

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ईद उल अझा का एक पैग़ाम

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ईद उल अझा का एक पैग़ाम
*ईद-उल-अज़हा का नया पैग़ाम* *क्या कुर्बान करें आज हम..* न नफ़रत की बलि चढ़े कोई इंसान, न बँटवारे की आग में जले अरमान, आओ ईद पर पूछे दिल से जहान, क्या कुर्बान करें आज हम! कुर्बान करें गुस्से को, जो रिश्ते जला दे, कुर्बान करें डर को, जो दीवार बना दे। कुर्बान करें भेदभाव की ज़ंजीरें पुरानी, जो इंसान को इंसान से कर दे बेगानी। एक गीत उठे हर ज़ुबान से, हिंदी, अरबी, तुर्की, फ़ारसी तान से। बच्चों का समूह जब साथ में गाए, तो लगे सारा जग एक परिवार हो जाए। ढोल की थाप पर तबला बोले, वायलिन संग रबाब भी डोले। रेगिस्तान से लेकर हिमालय तक, एक ही धड़कन, एक ही सबक। ईद नहीं बस रस्म क़ुरबानी की, ये दावत है रहमत-ओ-इंसानी की। इब्राहीम का सबक यही दोहराए, "अपने अंदर के हैवान को मिटाए।" ख़ंजर न उठाएँ किसी गले पर, मरहम रखें हर टूटे दिल पर। भूखे को रोटी, प्यासे को पानी, यही है असली कुर्बानी की निशानी। हम वारिस हैं एक ही मिट्टी के, एक ही सूरज, एक ही चाँद के बेटे। फिर क्यों सरहदों में बाँटे ख़ुद को, आओ तोड़ दें नफ़रत के परदे को। आओ इस ईद पर अहद करें, अना को झुकाएँ, अदावत को दफ़न करें। हम कुर्बान करें कीना, कुर्बान करें ज़हर, ताकि आने वाली नस्लें, जी सकें बेख़ौफ़ शहर। इंसानियत से बड़ी इबादत नहीं, मोहब्बत से ऊँची कोई अज़मत नहीं। आदित्य कुर्बान करें आज हम! अपना गुरूर, अपना वहम। 🌙 ईद-उल-अज़हा मुबारक एक दुनिया, एक परिवार, एक आवाज़। डॉ कर्नल आदिशंकर मिश्र ‘आदित्य’, ‘विद्यावाचस्पति’ ‘विद्यासागर’, लखनऊ

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