*हिंदू वैदिक परम्परा में सप्तपदी का अर्थ और सप्तपदी के सात वचन:*
पहला वचन (प्रथम पद):
तीर्थव्रतोद्यापन यज्ञकर्म मया सहैव प्रियवयं कुर्या:
वामांगमायामि तदा त्वदीयं ब्रवीति वाक्यं प्रथमं कुमारी!।
भावार्थ : कन्या अपने पहले वचन में वर से कहती है कि यदि आप कभी तीर्थयात्रा को जाओ तो मुझे भी अपने संग लेकर जाना। कोई व्रत-उपवास अथवा अन्य धर्म कर्म का कोई कार्य करें तो आज की भांति ही मुझे अपने वाम भाग में अवश्य स्थान दें। यदि आप इसे स्वीकार करते हैं तो मैं आपके वामांग में आना स्वीकार करती हूँ ।
दूसरा वचन (द्वितीय पद):
पुज्यो यथा स्वौ पितरौ ममापि तथेशभक्तो निजकर्म कुर्या:
वामांगमायामि तदा त्वदीयं ब्रवीति कन्या वचनं द्वितीयम!!
भावार्थ : कन्या अपने दूसरे वचन में वर मांगती है कि जिस प्रकार आप अपने माता-पिता का सम्मान करते हैं, उसी प्रकार मेरे माता-पिता का भी सम्मान करें तथा कुटुम्ब की मर्यादा के अनुसार धर्मानुष्ठान करते हुए ईश्वर भक्त बने रहें तो मैं आपके वामांग में आना स्वीकार करती हूं।
तीसरा वचन (त्रितीय पद):
जीवनम अवस्थात्रये पालनां कुर्यात
वामांगंयामितदा त्वदीयं ब्रवीति कन्या वचनं तृतीयं!!
भावार्थ : तीसरे वचन में कन्या वर मांगती है कि आप मुझे यह वचन दें कि आप जीवन की तीनों अवस्थाओं में मेरा पालन करते रहेंगे, तो ही मैं आपके वामांग में आने को तैयार हूं।
चौथा वचन (चतुर्थ पद):
कुटुम्बसंपालनसर्वकार्य कर्तु प्रतिज्ञां यदि कातं कुर्या:
वामांगमायामि तदा त्वदीयं ब्रवीति कन्या वचनं चतुर्थ:।।
भावार्थ : कन्या अपने चौथे वचन में कहती है कि अब तक आप घर-परिवार की चिंता से पूर्णत: मुक्त थे। अब जब कि आप विवाह बंधन में बंधने जा रहे हैं तो भविष्य में परिवार की समस्त आवश्यकताओं की पूर्ति का दायित्व आपके कंधों पर है। यदि आप इस भार को वहन करने की प्रतिज्ञा करें तो ही मैं आपके वामांग में आ सकती हूं।
पांचवां वचन (पंचम पद ):
स्वसद्यकार्ये व्यहारकर्मण्ये व्यये मामापि मन्त्रयेथा,
वामांगमायामि तदा त्वदीयं ब्रूते वच: पंचमत्र कन्या!!
भावार्थ : पांचवें वचन में कन्या वर मांगती है कि जो वह कहती है, वह आज के परिप्रेक्ष्य में अत्यंत महत्व रखता है। वह कहती है कि अपने घर के कार्यों में, लेन-देन अथवा अन्य किसी हेतु खर्च करते समय यदि आप मेरी भी मंत्रणा लिया करें तो मैं आपके वामांग में आना स्वीकार करती हूं।
छठवां वचन (षष्ठ पद):
न मेपमानमं सविधे सखीना द्यूतं न वा दुर्व्यसनं भंजश्वेत,
वामाम्गमायामि तदा त्वदीयं ब्रवीति कन्या वचनं च षष्ठम!!
भावार्थ : कन्या अपने छठे वचन में कहती है कि यदि मैं अपनी सखियों अथवा अन्य स्त्रियों के बीच बैठी हूं, तब आप वहां सबके सम्मुख किसी भी कारण से मेरा अपमान नहीं करेंगे। यदि आप जुआ अथवा अन्य किसी भी प्रकार के दुर्व्यसन से अपने आपको दूर रखें तो ही मैं आपके वामांग में आना स्वीकार करती हूं।
सातवां वचन (सप्तम पद):
परस्त्रियं मातूसमां समीक्ष्य स्नेहं सदा चेन्मयि कान्त कूर्या।
वामांगमायामि तदा त्वदीयं ब्रूते वच: सप्तमंत्र कन्या!!
भावार्थ : कन्या अपने अंतिम वचन के रूप में वर मांगती है कि आप पराई स्त्रियों को माता के समान समझेंगे और पति-पत्नी के आपसी प्रेम के मध्य अन्य किसी को भागीदार न बनाएंगे। यदि आप यह वचन मुझे दें तो ही मैं आपके वामांग में आना स्वीकार करती हूं।
मैत्री सप्तपदीन मुच्यते’ इसका अर्थ होता है कि एक साथ सिर्फ 7 कदम चलने से ही दो अनजान लोगो में भी मित्र का भाव उत्पन्न हो जाता है, अतः जीवनभर का साथ निभाने के लिए शुरुवात के 7 पदों की गरिमा एवं प्रधानता को स्वीकार किया गया है। सातवे पग में वर, कन्या से कहता है कि ‘हम दोनों 7 पद चलने के पश्चात परस्पर मित्रवत हो गए हैं।’
सात फेरे ही क्यों होते है ?
आइये देखते हैं ऐसा क्यों है – भारतीय संस्कृति में 7 की संख्या मानव जीवन के लिए बहुत महत्वपूर्ण मानी गई है। जैसे हम देखते हैं इंद्रधनुष के 7 रंग, 7 ग्रह, 7 तल, 7 समुद्र, 7 ऋषि, सप्त लोक, 7 चक्र, सूर्य के 7 घोड़े, सप्त रश्मि, धातुओं की बात करें तो सप्त धातु, सप्त पुरी, 7 प्रकार के तारे, सप्त द्वीप अर्थात 7द्वीप, 7 दिन, मंदिर या मूर्ति की 7 परिक्रमा, संगीत के 7 सुर आदि का उल्लेख किया जाता रहा है। यही सभी ध्यान रखते हुए अग्नि के 7 फेरे लेने का प्रचलन भी है जिसे ‘सप्तपदी’ कहा गया है।
यहाँ आपको ‘सप्तपदी क्या है’ के विषय में जानकारी प्रदान की गई।
डॉ कर्नल आदि शंकर मिश्र
‘आदित्य’, ‘विद्यावाचस्पति’
लखनऊ
हिन्दू धर्म में सप्तपदी का महत्व
हिन्दू धर्म में सप्तपदी का महत्व
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