कर राष्ट्र का उद्धार तू!
शस्य-श्यामला धरा तेरी,
माता का कर श्रृंगार तू।
कोटि-कोटि स्वर्ग बसा,
कर वंदन बारंबार तू।।
बूंद-बूंद निज रक्त का,
बहा वतन के नाम तू।
सर्वस्व समर्पण है यही,
राष्ट्र-धर्म को पहचान तू।।
जीवन का लक्ष्य यही है,
राष्ट्र-प्रेम को जान तू।
तप यही है-सिद्धि यही,
सांस-सांस कुर्बान तू।।
धिक्कार रहा है मन तेरा,
कर्तव्य से क्यों अनजान तू?
मातृभूमि-रक्षा की खातिर,
दे निज यौवन बलिदान तू।।
जन्म का उद्देश्य यही है,
मृत्यु स्वयं की तार तू।
राष्ट्रीयता का मंत्र यही है,
कर राष्ट्र का उद्धार तू।।
-।।'ओज'।।-
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