गोवर्धन पूजा
(स्वरचित कहानी)
उत्तर प्रदेश के एक छोटे-से गाँव में महेश अपनी माता जी, जीवनसंगिनी और पाँच वर्षीय पुत्र गोपाल के साथ रहते थे। गाँव में दीपावली का उत्सव शुरू होने वाला था।
दीपावली से एक दिन पहले गाँव के पंडित जी महेश के घर आए। आँगन में बैठे ही थे कि माता जी ने पूछा —
“पंडित जी, इस बार कुछ लोग 20 अक्टूबर को दीपावली मना रहे हैं, तो कुछ 21 अक्टूबर को, तो फिर गोवर्धन पूजा कब की होगी?”
पंडित जी मुस्कुराए और बोले —
“माता जी, दीपावली तो हर वर्ष अमावस्या की रात को ही मनाई जाती है। इस बार भी दीपावली 20 अक्टूबर को ही होगी, क्योंकि दोपहर 3:44 बजे से अमावस्या प्रारंभ हो जाएगी और दीपावली सदैव अमावस्या की रात्रि में ही मनाई जाती है। चूँकि 21 अक्टूबर को शाम 5:54 बजे तक अमावस्या रहेगी, इसलिए यह दिन अगम रहेगा और गोवर्धन पूजा अगले दिन, अर्थात 22 अक्टूबर को मनाई जाएगी।”
नन्हा गोपाल ध्यान से पंडित जी और माता जी की बातचीत सुन रहा था। उसके मन में कई प्रश्न उठ रहे थे, पर वह उन्हें पूछ नहीं पाया। रात गहराने लगी और गोपाल सो गया।
दो दिन बाद गोवर्धन पूजा का दिन आया। दादी गोबर से छोटे-छोटे गोवर्धन पर्वत बना रही थीं। उनके हर कार्यकलाप में श्रद्धा और प्रेम झलक रहा था।
गोपाल ने उत्सुकता से पूछा —
“दादी, हम यह गोवर्धन पूजा क्यों करते हैं? क्या इससे धरती माँ सच में खुश होती हैं या यह बस एक परंपरा है?”
दादी ने स्नेह भरी मुस्कान के साथ उत्तर दिया —
“बेटा, यह पूजा केवल प्रतीक नहीं है। यह धरती, वर्षा, गाय और अन्न के प्रति हमारी कृतज्ञता का पर्व है। जब हम अपने हाथों से गोबर के पर्वत बनाते हैं, गौमाता को सजाते हैं और अन्नकूट तैयार करते हैं, तब हम प्रकृति को प्रणाम करते हैं। यह हमें याद दिलाता है कि हमारा जीवन उसी की देन है। यह पूजा अनुष्ठान से बढ़कर मानव भावना की अभिव्यक्ति है।”
गोपाल ध्यानपूर्वक सुनता रहा। उसने देखा कि पूरा गाँव एक परिवार की तरह जुटा हुआ है। बच्चे, युवा और बुज़ुर्ग सभी इस उत्सव की तैयारी में लगे हैं। गलियाँ फूलों, रंगोली और दीपों से सजी हैं। सजी-धजी गायें शांत खड़ी हैं, मानो वे भी इस पर्व का आनंद ले रही हों।
उसी समय महेश खेत से लौटा। थके स्वर में उसने कहा —
“माँ, अब इन रस्मों की क्या ज़रूरत है? खेतों में मशीनें हैं, नए तरीके हैं — ये सब तो पुराने जमाने की बातें हैं।”
माता जी ने शांत स्वर में उत्तर दिया —
“बेटा, तकनीक हमारी मेहनत को आसान कर सकती है, पर यह हमें प्रकृति से जोड़ नहीं सकती। ये परंपराएँ हमें याद दिलाती हैं कि धरती हमारी मित्र है। जब हम उसे भूल जाते हैं, तब असंतुलन आता है। यह पूजा केवल पर्वत बनाने या व्यंजन सजाने का नाम नहीं बल्कि यह हृदय की पूजा है। जब हम हृदय से धन्यवाद करते हैं, तभी यह पूजा पूर्ण होती है।”
माता जी के शब्द महेश के हृदय में उतर गए। उसने अपने बेटे गोपाल को भी पूजा की तैयारी में शामिल होने को कहा और स्वयं गोबर से गोवर्धन पर्वत बनाने में लग गया।
गोपाल ने अपने छोटे हाथों से गोबर में रंग मिलाया और पर्वत पर फूल सजाए। उसके चेहरे पर श्रद्धा की आभा झलक रही थी।
महेश ने गोपाल की ओर देखकर कहा —
“बेटा, कुछ दिन पहले गाँव में कुछ गायें बीमार पड़ी थीं और खेतों में कीट बढ़ गए थे। यह निश्चित ही प्राकृतिक असंतुलन का परिणाम रहा होगा। तुम्हारी दादी ठीक ही कहती हैं — जब हम प्रकृति से दूर होते हैं, तो कठिनाइयाँ बढ़ती हैं।”
गोपाल ने कहा —
“पापा, इस बार हम पूजा पूरी श्रद्धा से करेंगे न? धरती माँ ने हमें अन्न, पानी और जीवन दिया है — उन्हें धन्यवाद देना चाहिए।”
महेश ने मुस्कुराते हुए सिर हिलाया। ऐसा लगा कि उसके भीतर परिवर्तन का भाव जाग उठा है।
पूरे गाँव में खुशी का माहौल था, बच्चे गोबर से पर्वत बना रहे थे। बुज़ुर्ग उन्हें सिखा रहे थे कि यह केवल सजावट नहीं, बल्कि भावना का प्रतीक है।
दादी ने गोपाल से कहा —
“बेटा, यह जो फूल हम पर्वत पर लगाते हैं, वे हमारे हृदय की श्रद्धा हैं। जितना मन लगाकर इन्हें सजाओगे, उतनी ही सच्ची पूजा होगी।”
गोपाल बोला —
“दादी, मैं चाहता हूँ मेरा पर्वत सबसे सुंदर लगे, ताकि धरती माँ खुश हों।”
दादी ने मुस्कुराकर कहा —
“यही भावना सबसे सुंदर है, बेटा।”
गाँव के लोग चावल, दाल, सब्जियाँ से अन्नकूट बना रहे थे और साथ मिठाइयाँ भी बना रहे थे। उनके हर व्यंजन में मेहनत, प्रेम और आभार झलक रहा था।
महेश अब पहले जैसे नहीं रहे। वे भी गाँववालों संग पूरे मन से काम में जुट गए थे।
संध्या होते ही गाँव दीपों की जगमगाहट से भर गया। लाल, सुनहरे और मिट्टी के दीप धरती को नई आभा दे रहे थे।
गोपाल ने अपने बनाए गोवर्धन पर्वत की ओर देखा और बोला —
“दादी, अब समझ आया — यह पूजा केवल पर्वत या व्यंजन की नहीं, हमारे हृदय की पूजा है।”
दादी ने उसे गले लगाते हुए कहा —
“हाँ बेटा, यही सच्चा संदेश है। जब हम हृदय से धरती माँ को धन्यवाद देते हैं, तभी यह पूजा पूर्ण होती है।”
महेश ने अन्नकूट और पर्वत के सामने हाथ जोड़कर प्रणाम किया। अब उसे महसूस हुआ कि यह केवल परंपरा नहीं, बल्कि प्रकृति से संवाद है।
महेश और उसका पाँच वर्षीय पुत्र गोपाल दोनों ने गोवर्धन पूजा के वास्तविक अर्थ को समझ लिया। उन्होंने तय किया कि भविष्य में हर वर्ष यह पूजा मनाई जाएगी। दोनों ने माता जी के चरणों में नमन करते हुए कहा —
“यह पूजा कोई परम्परा नहीं, बल्कि दिल से की जाने वाली साधना है।”
माता जी ने महेश और गोपाल को गोवर्धन पूजा के माध्यम से प्रकृति और जीवन के प्रति आभार का वास्तविक अर्थ समझाया। शुरुआत में महेश इसे केवल परंपरा मानता था, लेकिन माता जी और गोपाल की समझ व उत्सुकता ने उसे एहसास दिलाया कि पूजा पर्वत बनाने या अन्नकूट सजाने से अधिक, हृदय से धरती, गाय और अन्न के प्रति श्रद्धा और प्रेम व्यक्त करने का पर्व है। इसके बाद महेश और गोपाल ने तय किया कि वे हर वर्ष गोवर्धन पूजा हृदय से साधना की तरह मनाएंगे।
🙏 योगेश गहतोड़ी "यश"
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