कलम संगिनी

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हमारे धर्म ग्रंथ और देवभाषा संस्कृत

adi.s.mishra

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हमारे धर्म ग्रंथ और देवभाषा संस्कृत

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हमारे धर्म ग्रंथ और देवभाषा संस्कृत
*सभी मंत्र और श्लोक तथा सभी धर्म ग्रंथ संस्कृत में क्यों होते हैं?* आइये इस तथ्य को विस्तार से समझ लेते हैं। मेरा मानना है कि सारे मंत्र/ श्लोक/ हिन्दू सनातन धर्म ग्रन्थ, रामायण, महाभारत, भगवद्गीता, वेद, पुराण, उपनिषद आदि संस्कृत में ही रचे गये थे, क्योंकि जब इनकी रचना की गई थी तो अन्य भाषाएँ होती ही नहीं थीं। शिव पुराण और विष्णु पुराण के अनुसार भगवान के पास कंपन (प्रतिध्वनि) की भाषा होती है, जबकि सदाशिव यानी परम सर्वोच्च शक्ति के पास मन की भाषा होती है, इसका मतलब है कि वह केवल आपकी भावनाओं से ही आपको समझ सकती है। ईश्वर के संबंध में, यह उच्च आवृत्ति और अधिक ऊर्जा वाली भाषा की तरह लगती है और संस्कृत एक ऐसी भाषा है, जिसमें हम एक पेज लंबा वाक्य कुछ ही शब्दों में कह सकते हैं। यदि इन पुराणों की व्याख्या करें और अपने वैज्ञानिक ज्ञान का उपयोग करें, तो इस निष्कर्ष पर पहुंचेंगे कि, उच्च आवृत्ति वाली ध्वनियाँ साधारण मनुष्य के द्वारा नहीं सुनी जा सकती हैं और चूंकि उनकी तरंगदैर्घ्य कम होती है, वे इच्छित लक्ष्य तक पहुंचे बिना आसानी से विचलित हो सकती हैं, इसलिए ऐसी समस्याओं से निपटने के लिए एक लंबे पृष्ठ की जानकारी को कुछ शब्दों में कोडित करना होगा जो संस्कृत में संभव है। दूसरा, संस्कृत भाषा में हम जो कंपन पैदा करते हैं वह उच्च आवृत्ति में परिवर्तित हो जाती है जो कि देवताओं की भाषा है। तो शायद यही कारण है कि सभी मंत्र संस्कृत में हैं। संस्कृत स्वयं भगवान सदाशिव ने भगवान शिव जी को सिखाई थी, जिन्होंने बाद में इसे सप्तकृष्य और फिर अन्य ऋषियों को दिया, जिन्होंने बाद में इसे अन्य गणमान्य व्यक्तियों को दिया। अतः इन पुराणों के अनुसार संस्कृत की रचना मनुष्यों द्वारा नहीं की गई थी, यह एक ईश्वर प्रदत्त भाषा है जिसका निर्माण तब हुआ जब सदाशिव ने स्वयं को देवताओं में विभाजित कर लिया था। इसके इतर भारत की हिंदी सहित लगभग सभी भाषाओं की उत्पत्ति संस्कृत से ही हुई है।वस्तुतः संस्कृत सभी भारतीय भाषाओं की मूल भाषा है, जननी है। हम गायत्री मंत्र, महामृत्युंजय मंत्र अक्सर सुनते हैं जो संस्कृत में हैं, खासतौर से जब कार में ड्राइवर सीट पर बैठे होते हैं तो मैंने देखा है कि यही कैसेट सुने जाते हैं, और शायद आसानी से आनंद लेते हैं, इसीलिये इन मंत्रों को टानिक की संज्ञा दी जाती है। किंचित मेरे इस स्पष्टीकरण से हम सब संतुष्ट होंगे और सहमत भी होंगे! जहाँ तक धर्म गुरुओं द्वारा संस्कृत में प्रवचन देने की बात है तो उनका प्रयत्न यह भी होता है कि उसे सरल भाषा में भी अनुवाद कर समझा सकें। उत्तर भारत में प्रचलित सत्यनारायण व्रत कथा मूल रूप में संस्कृत में ही है लेकिन हर कथा वाचक हिंदी में भी अनुवाद कर सुनाते हैं। कुछ लोगों को शायद यह लगता है कि सत्यनारायण व्रत कथा केवल हिंदी में ही है। उसी प्रकार सभी धर्म ग्रंथों में स्थानीय भाषाओं में अनुवाद भी इन्ही विद्वानों ने किये हैं। रामायण और महाभारत जैसे सामाजिक, पारिवारिक, सांस्कृतिक और धार्मिक ग्रंथों के बहुत सी भाषाओं में अनुवाद उपलब्ध हैं। जिन जिज्ञासु भक्तों को समझने की इच्छा होती है वे अवश्य कोशिश करते हैं। गीता और रामचरित मानस के अखंड पाठ तो काफ़ी प्रचलित हैं, जो हिंदी में ही होते हैं। आज देव भाषा संस्कृत की फिर से समाज में जागरूकता लाने की आवश्यकता है क्योंकि संस्कृत मात्र एक धार्मिक भाषा ही नहीं है अपितु संस्कृत एक वैज्ञानिक भाषा भी है। आज पाश्चात्य जगत संस्कृत के धर्म ग्रंथों, मंत्रों और सूत्रों का अपनी भाषा में अनुवाद कर वैज्ञानिक उपयोग में ला रहा है, जब कि हमारे देश भारत में उन्ही पाश्चात्य अनुसंधानों की प्रशंसा की जाती है जो संस्कृत भाषा से लिये गए हैं। विद्यावाचस्पति डा० कर्नल आदिशंकर मिश्र ‘आदित्य’ लखनऊ

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