कलम संगिनी

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*मेरी माँ एक विलक्षण कुशल गृहिणी*

adi.s.mishra

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*मेरी माँ एक विलक्षण कुशल गृहिणी*

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*मेरी माँ एक विलक्षण कुशल गृहिणी*
*मेरी माँ श्रीमती पद्मा मिश्रा एक विलक्षण कुशल गृहिणी* अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर विशेष तुम्हारे हाथ में वो जादू है जो कुछ बिगड़ने नहीं देता, तुम्हारे वजूद में वो ताक़त है जो हौसला गिरने नहीं देता। अपनी माँ (श्रीमती पद्मा मिश्रा) के लिए ये पंक्तियाँ लिखते हुए मुझे गहरा गर्व और भावुकता दोनों का अनुभव होता है। कुछ लोगों के बारे में कहा जाता है कि वे “पढ़े नहीं, कढ़े हुए” होते हैं—जीवन के अनुभवों ने जिन्हें तराशा होता है। मेरी माँ भी ऐसी ही हैं। पारिवारिक परिस्थितियों के कारण उनकी औपचारिक शिक्षा कक्षा आठ से आगे नहीं बढ़ सकी, लेकिन सीखने की उनकी जिज्ञासा कभी नहीं रुकी। हर कला को गहराई से समझना, उसे अपनाना और जीवन में उतार लेना—यह उनका स्वभाव बन गया। शायद यही कारण है कि 75 वर्ष की आयु में भी उनका आत्मविश्वास और हुनर उतना ही जीवंत है। मेरे पिता सेना में थे और अधिकतर समय सीमावर्ती क्षेत्रों में तैनात रहते थे। ऐसे में सेना के सेपरेट फैमिली क्वार्टर में हम बच्चों के साथ माँ ही हमारा पूरा संसार थीं। हमारी पढ़ाई-लिखाई से लेकर हमारे खान-पान और संस्कारों तक—सबकी जिम्मेदारी उन्होंने अकेले निभाई। घर का हर काम उनके लिए किसी चुनौती जैसा नहीं, बल्कि एक अवसर जैसा था। चाहे स्वादिष्ट पकवान बनाना हो, स्कूल का प्रोजेक्ट तैयार कराना हो, घर के नल की मरम्मत करनी हो या बिजली का स्विच ठीक करना—माँ सब कुछ अपने हाथों से कर लेती थीं। बाज़ार से सामान लाना, नए फैशन के कपड़े सिलना, या लेटेस्ट डिज़ाइन के स्वेटर बुनना—ये सब उनके लिए जैसे बाएँ हाथ का खेल था। हमारे बचपन की एक खास याद यह भी है कि हमने बाज़ार की बनी चीज़ें लगभग कभी खाई ही नहीं। माँ घर पर ही मिठाई, नमकीन, केक, जैम और जैली सब बना लेती थीं। सेना के जीवन ने उन्हें उत्तर से दक्षिण तक देश के अलग-अलग प्रांतों के लोगों के साथ रहने का अवसर दिया। उन्होंने गुजराती, मराठी, पंजाबी और दक्षिण भारतीय व्यंजन बनाना सीखा और फिर उनमें अपनी अवधी शैली का स्वाद मिलाकर ऐसी अनोखी रेसिपियाँ तैयार कीं कि हमारे दोस्तों को अपने टिफ़िन से ज्यादा हमारे टिफ़िन का इंतज़ार रहता था। शायद यही वजह रही कि हमें कभी बाज़ार के खाने का आकर्षण महसूस ही नहीं हुआ। सबसे मजेदार बात यह होती थी कि घर में जब भी समोसे बनते थे, बिना बताए मेहमान जरूर आ जाते थे—और माँ हर बार सबको उतने ही प्यार से खिलाती थीं। होली-दीवाली पर तो पकवान कनस्तरों में भर-भर कर बनते थे और हर तीज-त्योहार अपने साथ अलग-अलग स्वाद और खुशियाँ लेकर आता था। कपड़ों के मामले में भी माँ का हुनर कमाल का था। हमारे फ्रॉक और लहंगे से लेकर भाइयों की पैंट-शर्ट तक, सब वे खुद सिलती थीं। क्रोशिया, मैटी, जूट और अन्य चीज़ों से सुंदर सजावटी सामान बनाना, यहाँ तक कि रद्दी कागज़ को रिसाइकिल करके उपयोगी वस्तुएँ बनाना—ये सब मैंने उन्हीं से सीखा है। शायद यही कारण है कि आज भी मैं किसी भी चीज़ को फेंकने से पहले उसके बेहतर उपयोग के बारे में सोचती हूँ। मुझे आज भी याद है, जब 1989-90 के आसपास हम सागर (मध्य प्रदेश) से बरेली (उत्तर प्रदेश) आए थे। दोनों जगहों के मौसम में काफी अंतर था और एक साथ चार बच्चों के लिए गर्म कपड़े तैयार करना बड़ी चुनौती थी। तब माँ ने निटिंग मशीन खरीदी और बहुत कम समय में हम सभी के लिए स्वेटर तैयार कर दिए। उनके लिए समस्या का मतलब हमेशा समाधान ढूँढना ही रहा है। माँ की सबसे बड़ी पहचान उनका अटूट हौसला है। कई बार उनका हाथ-पैर टूटा, डॉक्टर ने उन्हें बेड रेस्ट की सलाह दी, लेकिन अगर कोई उनसे कोई रेसिपी पूछ ले तो वे उतने ही उत्साह से बताती हैं जैसे सब कुछ बिल्कुल सामान्य हो। घर में कुछ टूट-फूट जाए तो उसे कैसे ठीक करना है—ऐसे छोटे-छोटे जुगाड़ भी उनके पास हमेशा तैयार रहते हैं। आजकल माँ जीवन की एक और कठिन परीक्षा से गुजर रही हैं। वे दूसरी बार कैंसर से लड़ रही हैं। रीढ़ की हड्डी में तकलीफ के कारण उठने-बैठने में भी कठिनाई होती है, लेकिन उनके मन का साहस आज भी उतना ही मजबूत है। हाल ही में उन्होंने बाज़ार से आर्टिफिशियल ब्रेस्ट सपोर्ट खरीदने के बजाय उसे घर पर ही बनाने की कोशिश शुरू कर दी। अभी वह पूरी तरह सही नहीं बन पाया है, लेकिन मुझे पूरा विश्वास है—कुछ ही दिनों में वह भी उनके हुनर और जिद के आगे हार मान जाएगा। मेरे लिए मेरी माँ सिर्फ एक कुशल गृहिणी नहीं, बल्कि साहस, सृजनशीलता और आत्मनिर्भरता की जीवंत मिसाल हैं। उन्होंने हमें सिखाया कि सीमित संसाधनों में भी जीवन को सुंदर, सृजनात्मक और गरिमापूर्ण बनाया जा सकता है। उनके हाथों का जादू सिर्फ चीज़ों को नहीं, बल्कि लोगों के दिलों को भी सँवार देता है—और शायद यही एक सच्ची, विलक्षण गृहिणी की पहचान है। माँ तुम्हें नमन है। द्वारा :- डॉ रंजना द्विवेदी, लखनऊ 8 मार्च 2026

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