कलम संगिनी

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पंचपातक : पतन की पाँच धाराएँ

पंचपातक : पतन की पाँच धाराएँ

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पंचपातक : पतन की पाँच धाराएँ
🌺 *पंचपातक : पतन की पाँच धाराएँ* 🌺 (नशा, म्लेक्षता, मांसाहार, मुफ्तखोरी और कुसंग) 🍷💫 *नशा* 🍷💫 विवेक हरै, अंधा करि दे, मन भ्रम-जाल पसार। ज्ञान सुधा बिसराय प्राणी, खोजे विष का हार॥ जो पीकर सुख कहे उसे, माया-मद अभिमान। नशा बुझाए आत्मदीप, करे जड़ जीवन-प्राण॥ नशे में डूबा जीव जब, भूले निज पहचान। देह-सुखों को मानता, करता आत्म-अपमान॥ मद में खोया चेतन-मन, करे अधर्म विचार। नशा बना जब राज-मन, मिटे विवेक-द्वार॥ 🕉️ *श्लोक :* *मदिरा मोहिनी माया, हरति ज्ञानदीपम्।* *विवेकं नाशयत्येषा, पतत्यन्धः प्रमादतः॥* *यत्र मदो निवसति, तत्र धर्मो न तिष्ठति।* *नशायां हृदि जातायां, पतति जीवनोत्तमः॥* *अर्थ :* नशा मोहिनी माया है, जो ज्ञान का दीपक बुझा देती है और विवेक को नष्ट कर देती है। जहाँ नशा वास करता है वहाँ धर्म टिक नहीं सकता। जब हृदय में नशे का बीज अंकुरित होता है, तब श्रेष्ठ जीवन भी पतन की ओर चला जाता है। 😈🕳️ *म्लेक्षता* 😈🕳️ वाणी, वेश, व्रत हरै, करे मर्यादा क्षीण। संस्कारों के दीप झरे, मिटे सुगंध महीन॥ लज्जा-शील तजै मनुज, जब भूले तन-ज्ञान। म्लेक्षता बन आत्मघात, करे धर्म-अपमान॥ जब भूषा से भूल हो, वाणी हो विकार। म्लेक्षता तब जन्मती, करती धर्म-हार॥ संस्कृति से जो दूर हो, भूले कुल-सम्मान। मानव तन में रहि चले, पशु सम निष्प्राण॥ 🕉️ *श्लोक :* *वाणी वेशो व्यवहारः, यः म्लेक्षो नृणां भवेत्।* *संस्कारदीपशून्यत्वं, तमः तत्र प्रतिष्ठितम्॥* *संस्कारेषु विनष्टेषु, नृणां नास्ति विभूतयः।* *म्लेक्षभावे स्थितो लोको, हिंसारतिः प्रजायते॥* *अर्थ :* जब मनुष्य की वाणी, वेश-भूषा और व्यवहार म्लेच्छता में डूब जाते हैं, तब संस्कारों का दीपक बुझ जाता है और हृदय में अंधकार बस जाता है। जहाँ संस्कार नष्ट हो जाते हैं, वहाँ मनुष्यता की विभूतियाँ भी लुप्त हो जाती हैं — ऐसा समाज हिंसा और अराजकता में डूब जाता है। 🥩🩸 *मांसाहार* 🥩🩸 करुणा की जड़ काटि दे, निर्ममता का भाव। जहाँ हो हिंसा, वहाँ मरे, आत्मा का अभाव॥ अन्न तजै, प्राण-भक्षण करे, बुद्धि भ्रांत प्रचंड। मांसाहार से मरि गई, मन की मधुर छंद॥ जीव के भीतर जीव को, मारे जो अज्ञान। कैसे उस जीवन तले, जागे प्रभु का ज्ञान॥ अन्न अमृत, जीव नहीं, सत्य यही प्रमाण। मांसाहार मिटा गया, मन की निर्मल तान॥ 🕉️ *श्लोक :* *अहिंसा परमो धर्मः, इति वाक्यं सनातनम्।* *यो हन्यते स्वार्थतो जन्तुं, स पतत्येव न संशयः॥* *जीवदया रहितो लोको, दुःखयत्यात्मनं स्वयम्।* *मांससेवो न भोगाय, दुःखबीजाय केवलम्॥* *अर्थ :* अहिंसा परम धर्म है — यह सनातन सत्य है। जो मनुष्य स्वार्थवश प्राणियों की हिंसा करता है, वह निश्चय ही पतन को प्राप्त होता है। जिस समाज में जीवों के प्रति दया नहीं होती, वह स्वयं को ही दुःख देता है। मांसभक्षण कोई भोग नहीं, बल्कि दुःख के बीज बोने जैसा है। 💰🪤 *मुफ्तखोरी* 💰🪤 परिश्रम से जो भागता, माँगे बिना कर्म। वह जग का भ्रमित जीव, करे अधर्म का धर्म॥ दूसरों के श्रम पर जो जी, लज्जा का प्रतिमान। मुफ्तखोरी का विष बने, हृदय में अपमान॥ जो न कमाए किंतु चहे, जग का मान-समान। वह न बने मानव कभी, करे जग-अपमान॥ कर्म बिना जो फल चखे, बढ़े अधर्म विचार। मुफ्तखोरी में डूबकर, खोए जीवन-सार॥ 🕉️ *श्लोक :* *कर्महीनो नरो मूर्खः, परदत्तं च भुञ्जते।* *लज्जां त्यज्य स्वसिद्ध्यर्थं, भवति दीनवृत्तकः॥* *स्वकर्मणा लभते श्रीं, परकर्मणा पतत्यसौ।* *मुफ्तसेवो न सौख्याय, दुःखदायि हि मानवम्॥* *अर्थ :* जो व्यक्ति कर्म त्यागकर दूसरों का दिया हुआ भोगता है, वह मूर्ख और दीन वृत्ति वाला बन जाता है। मनुष्य अपने कर्म से ही सुख-संपत्ति पाता है, पराधीन होकर वह पतित होता है। मुफ्तखोरी कभी सुख नहीं देती — वह आत्मा को निर्बल और जीवन को दुःखमय बना देती है। 👥🌪️ *कुसंग* 👥🌪️ सर्प समान मधुर मुख, मृदु वचन लगाए। ले डूबे साधक को, गर्त गहन गिराए॥ संग वही शुभ साधना, जहाँ सत्य आधार। कुसंग जलाए पावन-मन, करे जीवन-भार॥ सत्संग पुष्ट करे हृदय, कुसंग करे दुर्बल। दूषित जल सम दूषे मन, करे ज्ञान विफल॥ संग चुनो विवेक से, मोती सम मनहार। कुसंग छूए चेतना, करे जीव-संहार॥ 🕉️ *श्लोक :* *कुसङ्गे पतते बुद्धिः, सुबुद्धिर्विनश्यति।* *दुष्टसंगः पतनाय, सत्संगो मोक्षहेतवे॥* *यथा मलीनः कुसुमं, न गन्धाय तिष्ठति।* *तथा कुसङ्गितो जन्तुः, न पुण्ये स्थातुमर्हति॥* *अर्थ :* कुसंग से बुद्धि पतित हो जाती है और शुभ विचार नष्ट हो जाते हैं। दुष्टों का संग पतन का कारण है, जबकि सत्संग मोक्ष का मार्ग दिखाता है। जैसे गंदे फूल में सुगंध नहीं रहती, वैसे ही कुसंग में पड़ा व्यक्ति पुण्य में स्थिर नहीं रह पाता। *उपसंहार* 🍷💫😈🕳️🥩🩸💰🪤👥🌪️ पाँच अधर्म जहाँ न हों, वहाँ सत्व प्रवाह। सात्विकता का दीप तब, जीवन दे निर्वाह॥ पंचपातक त्याग कर, जो रखे सत्य विचार। वह धरती पर देव तुल्य, मानव में अवतार॥ सत्य, करुण, श्रम, साधना, बनें जीवन-सूत्र। ऐसा मानव देवसम, जग में बने सपूत॥ पाँच धार से जो बचे, साधक हो निर्वाण। उसके जीवन में खिले, धर्मधारा का ज्ञान॥ 🕉️ *श्लोक :* *नशो हरेत् विवेकं च, म्लेक्षता संस्कृतिं हरेत्।* *मांसाहारः कृपां हन्ति, मुक्तदानेन कर्म हि॥* *कुसङ्गो धर्मनाशाय, पञ्चपातकबन्धनम्।* *एतेभ्यः संरक्षणं हि, मानवत्वस्य रक्षणम्॥* *अर्थ :* नशा मनुष्य के विवेक को हर लेता है, म्लेक्षता (असंस्कार) उसके संस्कारों को नष्ट कर देती है। मांसाहार करुणा को समाप्त कर देता है, मुफ्तखोरी (परावलम्बन) परिश्रम और कर्मभाव को नष्ट करती है। कुसंग धर्म का विनाश कर देता है। ये पाँच ही आत्मा के बन्धन रूप पातक हैं। इनसे रक्षा करना ही सच्चे मानवत्व की रक्षा है। *अत: पंचपातक आत्मा की पाँच जंजीरें हैं, जो क्रमशः विवेक, संस्कार, करुणा, कर्म और धर्म को बाँधकर मनुष्य को पतन की ओर ले जाती हैं। जो इनसे स्वयं की रक्षा करता है, वही सच्चे अर्थों में मानवता की रक्षा करता है।* ✍️ योगेश गहतोड़ी "यश" (ज्योतिषाचार्य) मोबाईल: 9810092532 नई दिल्ली - 110059

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