काव्य
पद की चाह
गीत: "ऐसी चाह न कीजिए"
(तर्ज – ऐसी वाणी बोलिए)
ऐसी चाह न कीजिए, जो मन में विष घोले,
दूसर का मान मिटाने को, खुद के सुख को तोले॥
पद की खातिर लोग यहाँ, करते कितनी जंग,
ममता, प्रीति, दया सभी, हो गए अब संग्रंग॥
ऐसी दौड़ न दौड़िए, जो दिलों को तोड़े,
नाम प्रसिद्धि पाने को, जीवन बिखर जाए थोड़े॥
सच्चा पद तो वो भला, जो सेवा में आए,
जहाँ न घमंड का धुआँ, बस प्रेम ही मुस्काए॥
पद प्रतिष्ठा की दौड़ में, खो बैठा इंसान
सेवा में ही सुख बसे यही सच्चा ज्ञान।।
लोभ लालसा बढ़ चली, मन हुआ अंधा,
सत्य के रस्ते भूल गए, झूठ बना धंधा॥
सब ही दौड़े सिंहासन को, छोड़ दया का गाँव,
कोई न देखे गिरते को, बस अपनी ही ठाँव॥
सेवा में ही सुख बसे, यही सच्चा ज्ञान,
जग की माया झूठी रे, पद भी साथ न जाए,
जिसने मन को जीता है, वही अमर कहलाए॥
ऐसी चाह न कीजिए, जो मन में विष घोले,
दूसर का मान मिटाने को, खुद के सुख को तोले॥
पद पल-पल बदल रहा है, जैसे जीवन की राह,
कभी शिखर पर गौरव है, कभी संघर्ष की चाह।
समय का ये चक्र निरंतर, नहीं किसी का साथ,
पद तो पलभर का है बदल रहा हाथों हाथ ।।
स्वरचित काव्य रचना
श्रीमती प्रतिभा दिनेश कर
विकासखंड सरायपाली
जिला महासमुंद छत्तीसगढ़
पद की चाह
पद की चाह
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