कलम संगिनी

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तमाशा

HARNARAYAN KURREY

HARNARAYAN KURREY

1 Followers 93 Posts Oct 2025

तमाशा

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तमाशा
शीर्षक : "तमाशा" विधा : कविता मौलिक रचना भीड़ के बीच खड़ा हूँ, मैं खुद से अनजान, हर चेहरे पर नकाब है, हर हँसी एक पहचान। तालियों की गूँज में, सच दबकर रह जाता, तमाशा बनकर जीवन, मंच पर रोज़ नाचता। कोई रोता है भीतर, हँसता है बाहर-बाहर, आँसू भी बिक जाते हैं, जब चमकता हो बाज़ार। कठपुतली बन रिश्ते, डोर किसी और के हाथ, स्वार्थ की इस रोशनी में, बुझ जाती हर एक बात। वादों के इस मेले में, ईमान सस्ता पड़ा, शोर बहुत है चारों ओर, मौन कहीं खो गया। देखते-देखते हम भी, हिस्सा बन गए तमाशे का, आईना जब सामने आया, चेहरा अपना पराया लगा। किरदार बदलते रहते, पर मंच वही पुराना, हर दृश्य में दोहराया, वही धोखे का अफ़साना। सच बोलो तो ताने मिलें, चुप रहो तो सलाम, सिद्धांतों की इस बस्ती में, मौक़ा ही बना नाम। भीड़ जिसे पूजती है, वही सबसे बड़ा कलाकार, अंतरात्मा को बेचकर, बनता है वह सरदार। काँच की तरह सपने, हाथों में चुभ जाते हैं, रोशनी के पीछे भागें, साये ही रह जाते हैं। तमाशे की इस दुनिया में, सब दर्शक, सब पात्र, कोई राजा, कोई जोकर, कोई टूटे हुए पात्र। पर एक दिन पर्दा गिरेगा, थमेगा यह शोर-गुल, जब खुद से आँखें मिलेंगी, दिखेगा असली मूल। तब समझ आएगा शायद, जीवन कोई खेल नहीं, तमाशा छोड़ सच चुनना—सबके बस की बेल नहीं। रचनाकार "कौशल" मुड़पार चु छत्तीसगढ़ 05.01.2026

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