कलम संगिनी

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दादा-दादी और नाना-नानी पर एक बच्चे का निबन्ध

adi.s.mishra

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दादा-दादी और नाना-नानी पर एक बच्चे का निबन्ध

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दादा-दादी और नाना-नानी पर एक बच्चे का निबन्ध
*हमारे सबसे अच्छे दादा-दादी और नाना-नानी* *एक बच्चे का लेख* हमारे दादा-दादी, नाना-नानी लोग बूढ़ी महिला और बूढ़े पुरुष होते हैं, जो हमें बहुत प्यार करते हैं और वे हमें सबसे अच्छे लगते हैं। उनके अपने छोटे बच्चे नहीं होते। इसलिये वे हमेशा अपनो के बच्चों को बहुत पसंद करते हैं और प्यार करते हैं। वे दूर गांव या दूसरे शहर में रहते हैं और जब वे आते हैं तो हमें उन्हें लेने के लिए एयरपोर्ट या रेलवे/बस स्टेशन जाना होता है और बाद में वापस छोड़ने भी जाना होता है। वे लोग बहुत बूढ़े होते हैं और बाहर का बना खाना पसंद नहीं करते हैं, केवल घर में बना खाना खाते हैं। जब वे हमें घुमाने ले जाते हैं, तो वे हमेशा बहुत धीरे धीरे चल पाते हैं, क्योंकि वह बहुत तेज़ नहीं चल पाते हैं। वे हमसे रामायण, गीता, भजन, श्लोक और भगवान के बारे में बहुत प्यारी और भक्ति पूर्ण बातें करते हैं। वे किसी को कभी भी बुरे शब्द नहीं बोलते हैं। वे सब लोग सुबह बिना चीनी वाली चाय या कॉफी पीते हैं। वे चश्मा पहनते हैं। वे ब्रश करने के लिए अपने दाँत भी निकाल सकते हैं। मेरी दादी और मेरी नानी हमेशा मम्मी से ज़्यादा अच्छा और स्वादिष्ट खाना बनाती हैं। दादा जी और नाना जी हमें ऐसी ऐसी कहानियाँ सुनाते हैं जो पुस्तकों की कहानियों से भी ज्यादा रोचक होती हैं। एक बात और है कि वे हमारे मम्मी-पापा की तरह नहीं लड़ते हैं, सबको समझाते हैं कि शांति से बात करो, शांति से रहो। मेरा तो मानना है कि हर किसी को कोशिश करनी चाहिए कि उसके पास दादी-दादा, नाना-नानी हों। वे हमारे साथ प्रार्थना करते हैं और हमें प्यार करते हैं। दादा-दादी और नाना-नानी दुनिया के सबसे समझदार आदमी होते हैं लेकिन वे लोग बड़े भुलक्कड़ भी होते हैं। वे अपना चश्मा, अपनी चीजें रखकर भूल जाते हैं! फिर सबको ढूँढने के लिए कहते हैं। सबको और सभी परिवार वालों को, दादा-दादी, और नाना-नानी की हर बात सुननी चाहिए, माननी चाहिए और उनकी सेवा और देख भाल खूब करनी चाहिए। डॉ कर्नल आदि शंकर मिश्र ‘आदित्य’, ‘विद्यावाचस्पति’ लखनऊ

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