|| श्री कृष्णावतार ||
सतयुग त्रेता बीत गए द्वापर युग आया।
परमात्म सत्ता के पुन: अवतरित होने का समय आ गया|
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥
प्रभु का दिया हुआ वचन निभाने का समय आ गया।
कंस के अत्यचार से सारे ब्रिज्मंडल में हाहाकार मचा था।
चाणूर, मुष्टिक और पूतना आदि असुरों ने भी उत्पात मचा रखा था।
सभी ब्रजवासी आताकंकित थे त्रसित थे।
आई वह शुभ घडी शुभ मुहूर्त।
भाद्रपद कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि मध्य रात्रि रोहिणी नक्षत्र का शुभ मुहूर्त।
माता देवकी के कक्ष में प्रकाश छा गया।
प्रभु का दिव्य स्वरुप प्रकट हुआ।
तत्तक्षण दिव्य स्वरुप नन्हे शिशु श्री कृष्णचंद के रूप में प्रकट हो गए।
माता देवकी हर्षित हैं भाई कंस के डर से आतंकित भी हुईं।
पति वासुदेव से कहा शिशु को नन्द यशोदा के घर गोकुल पहुंचाने को।
और देवी यशोदा की कन्या को लाने को।
ईश्वरीय लीला प्रारभ हुई और देवकी वासुदेव की बेडी हथकड़ी खुल गई।
सो गए सारे पहरेदार खुल गए कारागार के सभी द्वार।
चल दिए वासुदेव पुत्र को लेकर।
यमुना जी प्रसन्न हुई प्रभू के दर्शन पा कर।
यमुना जी ने बालक श्रीकृष्ण का चरण स्पर्श किया।
वासुदेव जी को गोकुल पंहुचा दिया।
वासुदेव जी यशोदा कन्या महामाया को लेकर आ गए कारागार में ।
सब कुछ यथावत हो गया कारागार में।
श्रीकृष्ण जी का अवतार हो गया द्वापर में।
कवियित्री सुभद्रा द्विवेदी ‘विद्यावाचस्पति’, लखनऊ
श्री कृष्णावतार
श्री कृष्णावतार
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