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शिर्षक — हवा
विधा - व्यंग कविता
रचनाकार : कौशल
हवा कभी वादा बनकर आती, फिर झूठी बात उड़ाती है।
नेताओं वाली बोली लेकर, आँखों में धूल झोंक जाती है॥
कभी महँगाई बनकर बोले, थाली की खुशियाँ खा जाए।
जेब में बचते तीन रुपये, दस का सामान ले भाग जाए॥
कागज में बैठी योजनाएँ, हक़ में हवा ही मिलती है।
धरती पर कोई काम न दिखे, ऊपर से सब कुछ खिलती है॥
पंखों में फौरन घुसकर बोले, “हवा खराब" का इल्ज़ाम।
दोष किसी का, मार पड़े फिर, जनता बन जाती निष्काम॥
मौसम जैसे, रंग बदलते, पाला अक्सर बदल जाए।
सत्ता के संग बदल-बदलकर, हर नारा रूप नया लाए॥
टीवी चैनल की ख़बरों में, हवा उछलकर नाच रही।
सच का पत्ता ढूँढें कोई, बस झूठी आहट बाँध रही॥
कभी चुनावी मंच सजाकर, भाषण की आंधी चलती है।
छोड़ हवा के झुनझुने फिर, जनता को चुप रखती है॥
कभी हवा बनकर महक उठे, पर महक भी बस दिन चार की।
फिर सड़ांधों सा रूप धरें, बातें सब बेईमानों की॥
बड़ी प्रगति के सपने देकर, हवा इमारत बन जाती।
नींव हिलाने लगती पर, जिम्मेदारी सो जाती॥
माइक पकड़कर बोले नेता, “विकास की हवा आई है”
जन—जन पूछे कौन-सी वो? जेब छूते घबराई है॥
हवा कभी गुनहगार बने, आँखों में धुआँ भर लाए।
फाइलों वाली चक्की पीसे, केस हवा-सा उड़ जाए॥
हवा चुनाव जीतने वाली, पाँच साल बाद लौटेगी।
आश्वासन की चाभी लेकर, फिर तालों में फँस जाएगी॥
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हवा
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