मायके के दो पल (मेरा घर)
चल रहे थे अंतर्मन में द्वंद ,
कैसे जा पाऊंगी मां बिन मायका बनके नन्द।
हर दीवार ,हर कोना पुकारे ,
तेरे बिना मां, सब सूने, सब अधूरे।
आंगन वही, पर छाँव नहीं,
तेरी आवाज़, अब कहीं नही ।
हर कदम पर तेरी याद आई ,
मां के बिन हर राह पराई ।
पहली बार आई मां बिन,
मन हुआ रो पड़े दर्पण बिन।
खालीपन था, पर कहीं सुकून भी,
लगता था जैसे मां यहीं हो अभी।
हवा में तेरी खुशबू थी,
दीवारों में तेरी बात थी,
रसोई में तेरी बातें गूँजे,
मन के रंध्रों में करुणा बूझे।
पल दो पल मैं ठहर गई वहीं,
आँखों से धार बही, याद में तेरी खो गई यहीं
श्रीजू ने दिया ढेर सारा प्यार
खूब मस्ती किए सभी इस बार ।
दादी की ममता को याद कर जब गुनगुनाई,
प्यार में डूबी ,हमारी आँख फिर भर आई।
नन्हीं सी सिया में दादी की झलक समाई,
उस्की मुस्कान देखकर कर ,आँख फिर भर आई।
सुकून मिला उस खालीपन में,
जैसे मां समाई हो हर कण कण में।
❣️❣️❣️
स्वरचित काव्य रचना
प्रतिभा दिनेश कर
विकासखंड सरायपाली
जिला महासमुंद छत्तीसगढ़
मायके के दो पल
मायके के दो पल
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