कलम संगिनी

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मां और मेरी दिवाली ,, यादों का सुहाना सफर

मां और मेरी दिवाली ,, यादों का सुहाना सफर

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मां और मेरी दिवाली ,, यादों का सुहाना सफर
काव्य ""मां ""और मेरी दिवाली ***यादों का सुहाना सफर*** मां का दिवाली पर सजना सजाना , याद बहुत आता है वो वक्त बेगाना। माँ का दौड़-दौड़ कर पूजा सजाना, मुस्कुराकर हर कोना चमकाना। तोरण को खुद ही सजा देती थी, हर रंग में खुशियाँ भर देती थी। मुझे कहती — “बना रंगोली गोल वाली”, फिर हँसकर लगाती टीका लाली। दीये गिनती — “इकावन पूरे हों बेटा”, हर लौ में झलकता था उसका चेहरा। छत पर हम साथ मोमबत्तियाँ जलाते, फिर नीचे आकर फोटो क्लिक करवाते। अब वो पल सिर्फ यादों में बसते हैं, माँ के बिना दीप भी धुंधले लगते हैं। हर दीवाली उसकी याद दिलाती, रौशनी में भी कमी सी छा जाती। कभी दीवाली थी ख़ुशियों का नाम, अब बन गई यादों का इल्ज़ाम। पहले गर्मियों में भी थी दीवाली सी बात, अब हर मौसम लगता है रात। अब ना कोई दिन है ऐसा खास, घर जाने का भी नहीं वो उल्लास। फिर भी चल पड़ा हूँ उसी डगर, जहाँ दर्द मिलेगा, पर है अपना घर। माँ थी तो त्यौहार में जान थी, मां से ही हमारी पहचान थी। अब बस यादों का सफ़र,,,,,,, #समर्पित मामी जी(मयंक)उनके लाल की ओर से स्वरचित प्रतिभा दिनेश कर विकासखंड सरायपाली जिला महासमुंद

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